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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · अध्याय 12

चितावणी कौ अंग

चितावणी कौ अंग

  1. Kabir 12.1Open verse →

    कबीर नौबति अपणीं, दिन दस लेहु बजाइ। ए पुर पटन ए गली, बहुरि न देखौ आइ॥

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    ―कबीर दास जी कहते हैं कि इस क्षण भंगुर संसार में अपने वैभव का प्रदर्शन थोड़े ही दिन किया जा सकता है। फिर काल जब मृत्यु के मुख्य मे शरीर को सुला देता है तो नगर, बाजार गली कही भी इसके दर्शन नही हो सकेंगे।

  2. Kabir 12.2Open verse →

    संदर्भ―शरीर क्षण भंगुर है। वैभव थोडे दिन का ही है अंत मे शरीर के साथ वह भी नष्ट हो जायगा। जिनके नौवति वाजती, मैंगल बॅधते बारि। एकै हरि के नावै विन, गए जन्म सब हारि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―जिन लोगो के दरवाजो पर सदैव वैभव सूचक नगाडे बजा करते थे और मदमस्त हाथी घूमा करते थे। वे वैभवशाली लोग भो ईश्वर के एक नाम के विना अपने जीवन को ससार मे व्यर्थं हो खो बैठे।

  3. Kabir 12.3Open verse →

    ​⁠संदर्भ―सासारिक वैभव थोडे दिनों का हो होता है मरणोपरात उसका चिह्न भी नहीं रह जाता है। अतः ईश्वर का नाम स्मरण कर जीवन को सार्थक करना चाहिए। ढोल दमामा दुड़ बड़ी, सहनाई संग मेरि। औसर चल्या बजाइ करि, है कोइ राखै फेरि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार ढोल नगाड़ा डुगड्डगी, शहनाई तथा मेटी को बजाते हुए मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। उनका वैभव और ऐश्वर्य मृत्यु को रोकने मे समर्थ नहीं हो पाता है।

  4. Kabir 12.4Open verse →

    संदर्भ―कोई भी सासारिक आकर्षण मृत्यु को रोकने मे समर्थ नहीं है। सातों शब्द जु बाजते, घरि घरि होते राग। ते मन्दिर खाली पड़े, बैसण लागे लाग॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―जिनके दरवाजे पर सप्तस्वरो का राग बजता या अर्थात् जहाँ वैभव का प्रत्येक उपकरण उपस्थित था माज वे वैभवपूर्ण महल भी खालो पढे है उन पर आज पौए बैठे हुए हैं। उनका समस्त वैभव नष्ट हो गया है।

  5. Kabir 12.5Open verse →

    संदर्भ―मृत्यु संपूर्णं वैभवो को नष्ट कर देती है। कबीर थोड़ा जीवडाँ, माड़े बहुत मॅगण। सबही ऊभा मेल्हि गया, राव रंक सुलितान॥

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    ―कबीर दास भी कहते है कि यह उनसे हुए भी कि जीवन क्षणिक है मनुष्य मानन्वोत्मास के वनेकानेक उपकरण डटाना रहता है और कठोर पर माल के द्वारा यह क्षण भर मे ही नष्ट कर दिया जाता हैं। राजा सब इस समार मे विदा हो जाता है। ​⁠शब्दार्थ―माँड़े बहुत मँडाण=बडे ठाट-बाट बाँध दिए। उभा=खड़ा। मेल्हि गया=नष्ट हो गया।

  6. Kabir 12.6Open verse →

    संदर्भ―मनुष्य जीवन को सुखमय बनाने के लिए नानावि प्रयास करता है और वे सुख के सघन पूर्ण भी नही हो पाते कि विनाश हो जाता है। इक दिन ऐसा होइगा, सब सूँ पड़ै विछोह। राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होइ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―एक दिन ऐसा अवश्य आयेगा जब कि मनुष्य का सभी से वियोग हो जायेगा। अतएव हे राजाओ। हे छत्र को धारण करने वालो। आप लोग आज ही सावधान क्यो नही हो जाते। ताकि बाद मे पश्चाताप न करना पडे।

  7. Kabir 12.7Open verse →

    कबीर पटण कारिवाँ, पांच चोर दस द्वार। जय राँणों गढ़ भेलिसी, सुमिरि लै करतार॥

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    ―कबीरदास जी का कहना है कि यह शरीर रजी सार्थवाह है जो आत्मा रूपी धन को लेकर चल रहा है। इसके साथ पाच चोर (काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह) उस धन को चुराने के लिए चल रहे हैं। दस छिद्रो ( ५ कर्मेन्द्रियाँ और ५ ज्ञानेन्द्रियाँ) के होने के कारण इस शरीर रूपी कारवाँ की दशा और भी शोचनीय हो रही है यमराज इस दुर्गं को नष्ट करने के लिए इस पर आक्रमरण अवश्य करेगा अतः ईश्वर का स्मरण करना चाहिए तभी रक्षा हो सकती है।

  8. Kabir 12.8Open verse →

    संदर्भ―साग रूपक के द्वारा शरीर पर यमराज के आक्रमरण को स्पष्ट किया गया है। कबीर कहा गरबियों, इस जीवन की आस। टेसू फूले दिवस चारि, खंखर अये पलास॥

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    ―कवीरदास जी कहते हैं कि इस नश्वर शरीर और जीवन की आशा मे मनुष्य को घमण्ड करना चाहिए। जिस प्रकार पलाश के वृक्ष मे चार दिन के लिए अर्थात् थोड़े समय के लिए टेसू (पलाश के फूल) आ जाते हैं वह हरा​भरा हो जाता है और फिर वह ठूंठ का ठूंठ ही रह जाता है। ठीक उसी प्रकार यह जीवन भी थोड़े दिनों तक आभा बिखेर कर नष्ट हो जाता है।

  9. Kabir 12.9Open verse →

    संदर्भ―क्षरण भंगुर जीवन में अभिमान नहीं करना चाहिए। कबीर कहा गरबियौ, देही देखि सुरंग। बछड़ियाँ मिलिबौ नहीं, ज्यूँ कांचली भुवंग॥

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    कबीरदास जी कहते हैं कि सुन्दर शरीर को पाकर-देखकर उस पर गर्व नहीं करना चाहिए क्योंकि जिस प्रकार सर्प केचुली को छोड़ने के बाद पुनः उसे नहीं धारण करता है उसी प्रकार आत्मा भी इस शरीर को छोड़ देने के बाद फिर उसमें नहीं प्रविष्ट होती है।

  10. Kabir 12.10Open verse →

    संदर्भ—शरीर को छोड़ने के बाद आत्मा उसमें प्रविष्ट नहीं होती इसलिए जीव को गर्व नहीं करना चाहिए। कबीर कहा गरबियौ, ऊँचे देखि अवास। काल्हि परयू म्वै लेटणां, ऊपर जामें घास॥

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    कबीरदास जी कहते हैं कि ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं को देखकर उस पर गर्व नही करना चाहिए। जीव यह नहीं जानता कि शीघ्र ही उसे कब्र में लेटना पड़ेगा और कब्र के ऊपर घास उग आएगी तेरा सारा वैभव नष्ट हो जायेगा।

  11. Kabir 12.11Open verse →

    संदर्भ—सांसारिक ऐश्वर्य पर गर्व नहीं करना चाहिए। कबीर कहा गरबियों, चाँम पलेटे हड्ड। हैं वर ऊपर छत्र सिरि, ते भी देवा खड्ड॥

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    कबीरदास जी कहते हैं कि चर्म से ढंकी हुई हड्डियों के सौन्दर्य पर गर्व करना ठीक नहीं है। जो लोग श्रेष्ठ पीढ़ी पर बैठकर और सिर पर छत्र धारण कर चलते हैं वे भी एक दिन कब्र में चले जाते हैं।

  12. Kabir 12.12Open verse →

    संदर्भ—जीवन की नश्वरता का संकेत है। कबीर कहा गरवियौं, काल गहै पर फेस। ना जाणौं कहाँ मारिसी कै घारै कै परदेस॥

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    ―कबीर कहते हैं कि हे जीव तेरे बालो को मृत्यु अपने हाथो मे पकड़े हुए है फिर भी तू व्यर्थं मे गवँ क्यो करता है। यह भी पता नहीं कि वह मृत्यु तुझे घर मे या परदेश मे कहाँ मारेगी।

  13. Kabir 12.13Open verse →

    ​⁠संदर्भ―मृत्यु एक न एक दिन सभी को नष्ट कर देती है अतः मनुष्य की गर्व नही करना चाहिए। यहु ऐसा संसार है, जैसा सैंबल फूल। दिन दस के व्यौहारको झूठै रंगि न भूलि॥

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    कबीरदास जी कहते हैं कि यह संसार उसी प्रकार है जिस प्रकार सेमर के फूल। सेमर का फूल ऊपर से ही आकर्षक होता है भीतर उसमे कोई तत्व नही होता है। इस थोड़े दिन के जीवन मे इसके झूठे दिखावे मे मनुष्य को अपनी वास्तविकता को नहीं भूल जाना चाहिए।

  14. Kabir 12.14Open verse →

    जांमण मरण विचारि करि, कूड़े कांम निबारि। जिनि पँथूँ तुझ चालणं, सोई पंथ सॅवारि॥

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    कबीरदास जी कहते हैं कि हे मनुष्य! तू जीवन मरण (आवागमन) को गम्भीरतापूर्वक विचार कर वासना जन्य कुकर्मों का परित्याग कर दे। जिस प्रभु-भक्ति के मार्ग पर तुझे अंततः चलना है तू उसे अभी से अपना ले।

  15. Kabir 12.15Open verse →

    संदर्भ―वासना प्रेरित कुमार्ग को छोड़कर मनुष्य को सुमार्ग को अपनाना चाहिए। विन रखवाले वाहिरा, चिड़ियै खाया खेत। आधा प्रधा ऊवरै, चेति सकै तो चेति॥

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    ―हे मनुष्य! सतगुरु रूपी रक्षक के अभाव मे तेरे मोक्ष रूपी खेत को कुछ तो काम क्रोधादि रूपी पाँच चोरो ने उडा लिया और कुछ वासना रूपी ​चिड़ियों ने खा लिया। अब भी यदि मंगल चाहता है तो सावधान होकर प्रभु -भक्ति में प्रवृत्त होकर उसको थोड़ा बहुत बचा ले।

  16. Kabir 12.16Open verse →

    हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी; केस जलै ज्यूँ घास। सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास॥

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    कबीर दास जी कहते हैं कि मरणोपरान्त इस शरीर की हड्डियाँ लकड़ी की भाँति और केश घास की तरह चिंता के ऊपर जलते हैं। इस प्रकार समस्त शरीर को जलता हुआ देखकर कबीर दास यह समझकर कि इस जीवन में कुछ नहीं है इससे विरक्त हो गये।

  17. Kabir 12.17Open verse →

    कबीर मन्दिर ढहि पड़या, सैंट भई सैंबार। कोइ चेजारा चिणि गया, मिल्या न दूजी बार॥

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    कबीरदास जी कहते हैं कि सैकड़ों बार काम क्रोधादि रूपी चोरों ने इस शरीर रूपी मकान में सेंध लगाई है। जिसके कारण यह पूर्ण रूप से दह कर गिर गया है। इसको चुनकर बनाने वाला कारीगर एक बार तो बना गया किन्तु दुबारा बनाने के लिए वह नही मिला।

  18. Kabir 12.18Open verse →

    संदर्भ—शरीर के नष्ट होने पर इसका बनाने वाला कारीगर इसकी मरम्मत नहीं करता वह बेकार ही हो जाता है। कबीर देखत ढहि पड़या, ईंट भईं सैंवार। करि चिजारा सौ प्रीतिड़ी, ज्यूं ढहै न दूजी बार॥

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    कबीर दास जी रहते हैं कि शरीर रूपी भवन को प्रत्येक ईंट में लेप लगा दी गई है जिससे शिघिन होकर कर यह भवन उड़ गया है। इसलिए चिरन्तन प्रभु रूपी कारीगर से प्रेम कर जिसमें दूसरी बार वह शरीर रूपी भवन फिर न उड़ जाय। फिर न जाय। ​⁠शब्दार्थ—प्रोतिड़ो=प्रेम। कबीर मन्दिर लाष का, जड़िया हीरै लालि॥

  19. Kabir 12.19Open verse →

    दिवस चारि का पेषणां, विनस जाइगा काल्हि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―कबीर दास जी कहते हैं कि यह शरीर रूपी मंदिर लाख का बना हुआ है इसमे हीरे और लाल जड़े हुए हैं यह देखने मे बहुत आकर्षक है किन्तु इसका यह आकर्षण शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा और यह (पाण्डवो के) लाक्षा गृह के के समान जलकर नष्ट हो जाएगा। शव्दार्थ―लाष=लाक्षा, लांख।

  20. Kabir 12.20Open verse →

    कबीर धूलि सकेलि करि, पुड़ी ज बाँधी एह। दिवस चारि का पेषणां अन्ति षहे की षहे॥

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    ―कबीर दास जी कहते हैं कि यह मानव शरीर धूल को इकट्ठा करके पुडिया के समान बाँध दिया गया है। इसकी साज-सज्जा कुछ ही दिनो की है और अन्त मे यह जिस मिट्टी से बना है उसी मिट्टी के रूप में परिवर्तित हो जाएगा।

  21. Kabir 12.21Open verse →

    कबीर जे घन्घै तौ घूलि, बिन घघै घूलै नहीं। तैं नर बिनहे मूलि, जिनि, घंघै मै ध्याया नहीं॥

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    ―कबीर का कहना है कि जो मनुष्य इस संसार मे सत्कर्मों में प्रवृत्त रहते हैं उनकी आत्मा स्वच्छ हो जाती है क्योकि बिना कर्मों के आत्मा स्वच्छ नहीं हो सकती। वे मनुष्य तो जाते ही नष्ट हो गये जो इस संसार मे कर्मों मे वृत्त होते हुए ईश्वर का स्मरण नहीं करते। शव्दार्थ―घघै=कर्म। घूलि=घुलना। विन=नष्ट हो गये।

  22. Kabir 12.22Open verse →

    कबीर सुपनै रैनि कै, उघड़ि आए नैन। जीव पड्या बहु लूटि मैं, जागै तो लैंण नदैण॥

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    कबीरदास जी कहते हैं कि जीवात्मा के अज्ञान रूपी रात्रि में सोते-सोते सहसा नेत्र खुल गये। सुप्तावस्था में वह नाना प्रकार के लेन देन में पड़ा हुआ था और जागने हो (ज्ञान प्राप्त होते ही) यह संसार के लेन देन से मुक्त हो गया।

  23. Kabir 12.23Open verse →

    ​ कबीर सुपनै रैनिकै, पारस जीय में छेक। जे सोऊँ तौ दोइ जणां, जे जागू तौ एक॥

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    कबीर दास जी कहते हैं कि अज्ञान रूपी रात्रि में माया के स्वप्न देखने के कारण पारस्त्ररूप ब्रह्म और जीव में अन्तर स्थापित हो गया। यही कारण है कि अज्ञान की सुप्तावस्थायें मुझमें और परमात्मा में भेद हो जाता है और ज्ञान की जागृता वस्था में कोई भेद नहीं रहता एकरूपता स्थापित हो जाती है।

  24. Kabir 12.24Open verse →

    कबीर इस संसार में, घणें मनिष मत हीण। राम नांम जांणैं नहीं आया टापा दीन॥

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    कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में अनेकों मनुष्य बुद्धिहीन है वह राम नाम के वास्तविक तत्व को न जान कर तिलक आदि लगाकर ही ईश्वर भक्त बनना चाहते हैं। संसार को धोखा देना चाहते है।"

  25. Kabir 12.25Open verse →

    कहा कियौ हम आइ करि, कहा कहेंगे जाइ। इत के भये न उतके, चाले मूल गँवार॥२॥५

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    कबीर दास जी कहते है कि हमने इस संसार में आकर आत्मा की मुक्ति के लिए कौन-कौन से कर्म किए हैं जिनको कि मरने के बाद ईश्वर के अमृत्व ​ वतलायेंगे। हमने न तो ऐसे कर्म किये हैं जिनसे इम लोक का जीवन सुधरता और न ऐसे सत्कर्म किए हैं कि परलोक का मार्ग हो सुधरता। अतः हम तो कही के न हुए जो पवित्र आत्मा परमात्मा से प्राप्त हुई थी वह भी गँवा बैठे।

  26. Kabir 12.26Open verse →

    आया अण आया भया, जे बहुरता संसार। पड़्या भुलांवां गाफिला, गये कुबधी हारि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―इस संसार मे आकर जो व्यक्ति नाना प्रकार के सासारिक आकर्षणो मे आकर पड़ जाते हैं वह संसार मे आकर भी न आने के समान मृत तुल्य है। वह भ्रम मे पड़ा हुआ बेहोश है और दुष्ट बुद्धि पराजित हो चुके हैं। शव्दार्थ―अण आया=न आने के समान। भुलांवा=भ्रम मे। कुवुषी =बुरी बुद्धि।

  27. Kabir 12.27Open verse →

    कबीर हरि की भगति बिन, धिग जीवरण संसार। धुँवा केरा धौलहर, जात न लागै बार॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―कबीरदास जी कहते हैं कि ईश्वर भक्ति के बिना इस संसार मे जीवित रहना घृणा स्पद है। मनुष्य को प्रभु भक्ति करनी ही चाहिए क्योंकि यह शरीर धुए के महल के समान हैं जिसके बिगड़ने मे तनिक भी देर नही लगती है। विशेष― (१) उपमा अलंकार (२) ‘धुआँ कैसे धौलहर देखि तू न भुलिरे।’ विनय पत्रिका मे तुलसी ने भी इसका प्रयोग किया है। शव्दार्थ―घ्रिग=घिषकार। घौलहर= महल। जात=नष्ट होते |

  28. Kabir 12.28Open verse →

    जिहि हरि की चोरी करी, गये राम गुण भूलि। ते बिधना बागुल रचे, रहे अरघ मुखि भूलि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―जिन मनुष्यों ने इस संसार मे आकर ब्रह्म के प्रति भी विश्वासघात किया है उसके गुरगो को भूल जाते हैं। उन्हों को विधाता बगुले का जन्म दे देता है जो लज्जावध अपना मुख नीचा किये खडे रहते है। ​

  29. Kabir 12.29Open verse →

    माटी मलणि कुंभार की घणी सहै सिरि लात। इहि औसरि चेत्या नहीं, चूका अब की घात॥

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    जिस प्रकार कुम्हार की मिट्टी को मलते समय अनेकों लातें खानी पड़ती है ठीक उसी प्रकार मनुष्य को भी नाना प्रकार को यातनायें भोगनी पढ़ती हैं इस लिए है जीव यदि तू इस जन्म में सावधान नहीं हुआ तो पुनः इस प्रकार का स्वर्णिम अवसर मिलना मुश्किल है।

  30. Kabir 12.30Open verse →

    इहि औसरि चेत्या नहीं, पसु ज्यूं पाली देह । राम नाम जांण्यां नहीं, अंति पड़ी मुख पेह॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    इस मनुष्य योनि में जिस व्यक्ति को चेत नहीं आया, परलोक को सुधारने की चेष्टा नहीं की और पशुओं के समान देह को ही पालता रहा अर्थात् पाशविक प्रवृत्तियो में ही लगा रहा। जीवन भर राम के महत्व को न पहिचान पाने के कारण अन्त समय में तुझे नष्ट होकर मिट्टी में मिल जाना पढ़ेगा।

  31. Kabir 12.31Open verse →

    राम नांम जांण्यों नहीं, लागी मोटी पोड़ि। काया हाँडी काठकी, ना ऊँ चढ़ै बहोड़ि॥

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    जीवन भर राम नाम के महत्व को नहीं जाना। सांसारिक प्रपंचो की मोटी तह जमा हो गई जिस प्रकार काठ की हाँडी एक ही बार चढ़ाई जा सकती है दुबारा वह चढ़ाने योग्य नहीं रह जाती है उसी प्रकार यह शरीर भी दुबारा प्राप्त नहीं हो सकता है।

  32. Kabir 12.32Open verse →

    राम नाम जांण्यां नहीं, बात विनंठा मूल। परत ढूंढ़ा ही हारिया परति पड़ी मुख धूलि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―हे जीवात्मा! तूने राम नाम के तत्व को नहीं जाना और इस प्रकार जड़ से हो बात को बिगाड़ दिया। व्यर्थं के सासारिक धन्धो मे तू यहाँ पर ईश्वर को ही हार गया अब मरने के अवसर पर तेरे मुख मे धूलि के अतिरिक्त और क्या हो सकता है?

  33. Kabir 12.33Open verse →

    ​⁠संदर्भ―मनुष्य को अपनी शक्ति संसार के व्यर्थं कार्यों मे नष्ट न कर प्रभु भक्ति मे ध्यान लगाना चाहिए। राम नाम जाण्याँ नहीं, पाल्यो कटक कुटुम्ब। धन्धा ही में मरि गया, बाहर हुई न बम्ब॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    हे जीवात्मा! तुमने राम नाम का स्मरण नहीं किया। सेना के समान छपने कुटुम्ब के पालन मे ही ‘जूझता रहा। इस प्रकार सांसारिक झझटो मे उलझते हुए जीवन का अंत हो गया किन्तु अहंकार से मुक्ति फिर भी न मिली।

  34. Kabir 12.34Open verse →

    मनिषा जनम दुर्लभ है, देह न बांरम्बार। तरवर थै फल झड़ि पड़्या, बहुरि न लागै डार॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    कबीर दास जी कहते हैं कि यह मानव जन्म बडी कठिनाई से प्राप्त होता है और यह शरीर बारम्बार नही प्राप्त होता है। जिस प्रकार एक बार वृक्ष से फल गिर जाने के बाद उसी शाखा में फिर से नहीं लग सकता उसी प्रकार मनुष्य देह भी दुबारा नहीं मिल पाती है।

  35. Kabir 12.35Open verse →

    कबीर हरि की भगति करि, तजि विषिया रस चोज। बार-बार नहीं पाइये, मनिषा जन्म की मौज॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―कबीर का कहना है कि मानव जन्म-प्राप्ति का सौभाग्य वारम्बार प्राप्त नहीं होता अतः हे जोवात्मा। विषय वासना युक्त माया पूर्ण क्षणिक ​आनन्द और सुखों का परित्याग कर प्रभु भक्ति मैं प्रवृत्त होगा बड़ी वास्तविक आनन्द है।

  36. Kabir 12.36Open verse →

    कबीर यहु तन जात है, सकै तौ ठाहर लाई। कै सेवा करि साधकी, कै गुण गोबिन्द के गाइ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    कबीर दास जी कहते हैं कि यह शरीर नश्वर हैं शीघ्र ही नष्ट हो जाने वाला है अतः यदि तु इसे उचित कार्य में लगा सके तो लगा ले। या तो तू साधुओं की सेवा में अपने मन और शरीर को लगा दे या फिर परमात्मा के गुणानुवाद कर ताकि तेरा परलोक सुधर जाय। विशेष—तुलसी ने भी लिखा है कि— "बिनु सत्संग विवेक न होई। राम कृपा बिन सुलभ न सोई॥" —मानस

  37. Kabir 12.37Open verse →

    कबीर यह तन जात है, सकै तौ लेहु बहोड़ि। नागे हाथूँ ते गये, जिनकै लाख करोड़ि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    फबीर दास जी कहते हैं कि यह शरीर व्यर्थ में ही नष्ट होता जा रहा है अब भी यदि इसका उद्धार करना चाहो तो अच्छे कर्मों में प्रवृत्त करो संसार में माया के पीछे बावला बना क्यों फिरता है जिनके पास लाखों और करोड़ों की सम्पदा थी वह भी मृत्यु के समय खाली हाथ ही यहाँ से ले गये। विशेष—(१) दृष्टान्त अलंकार। (२) तुलना कीजिए। इकट्ठे गर जहाँ जर सभी मुल्कों के माली थे। सिकन्दर जय चलां दुनिया से दोनों हाथ गाली थे।

  38. Kabir 12.38Open verse →

    यह तनु कांचा कुंभ है, चोट चेहूँ दिसि खाइ। एक राम के नांव बिन, जदि तदि प्रसै जाई॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―जिस प्रकार कुम्भकार का कच्चा घडा कुम्भकार की थपकी की चोट खाता रहता है उसी प्रकार यह शरीर भी सासारिक यातनाओ को सह रहा है। केवल राम नाम के अवलम्ब के बिना यह जव तब संसार में जन्म लेकर नाना प्रकार के कष्ट पाता है। विशेष:―रूपक अलंकार।

  39. Kabir 12.39Open verse →

    ​⁠संदर्भ―ईश्वर के नाम स्मरण के बिना इस शरीर को नानाविधि यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं। यह तन काचा कुंभ है, लियां फिरै था साथि। ढ़बका लागा फूटि गया, कछू न आया हाथि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    कुम्भकार का कच्चा घड़ा जिसे वह हाथ में लिए रहता है कोमल होने के कारण तनिक सी चोट लगने के कारण फूट जाता है और अस्तित्वहीन होने के कारण फिर हाथ मे कुछ नहीं रहता उसी प्रकार इस शरीर का भविष्य भी अनिश्चित होता है यह भी किसी समय नष्ट हो सकता है और नष्ट होने पर कुछ भी हाथ में नहीं आता है।

  40. Kabir 12.40Open verse →

    संदर्भ―शरीर का भविष्य अनिश्चित है। काँची कारी जिनि करै, दिन दिन बधै बियाधि। राम कबीरे रुचि गई, याही ओषदि साधि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―हे जीवात्मा! तू अपनी शरीर रूपी केंचुली को वासना से मत कलकित कर। काल रूपी शिकारी दिन प्रति दिन तुझे मार रहा है। कबीर दास जी ने तो अपनी रुचि ईश्वर भक्ति की ओर मोड दी है। हे प्राणी! तू भी उसी औषधि का सेवन कर।

  41. Kabir 12.41Open verse →

    संदर्भ―सासारिक तापो को औषधि एक मात्र प्रभु भक्ति ही है। कबीर अपने जीव तैं, ऐ दोइ वार्तें धोइ। लोभ बढ़ाई कारणैं, अछता मूल न खोइ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    कबीर दास जी कहते हैं कि हे जीव! तू अपने मन से दो बातों को बिल्कुल निकाल दे एक तो लोभ और दूसरे आत्म-प्रशसा से उत्पन्न अहंकार। इन्हीं दो वस्तुओं के कारण अपने अमूल्य धन परमात्मा को मत खो।

  42. Kabir 12.42Open verse →

    संदर्भ―लोभ और दर्पं से ही प्रभु भक्ति मे बाधा पड़ती है। ​ खंभा एक गइंद दोइ, क्यूं करि वंधिसि बारि। मानि करै तौ पीव नहीं, पीव तौ मानि निवारि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    कबीर दास जी कहते हैं कि हे जीव! तेरे पास हृदय रूपी खम्भा तो एक है और उस खम्भे में बाँधने के लिए दो हाथी प्रभु-भक्ति और अहं हैं। वे दोनों एक ही खम्भे से कैसे बांधे जा सकते हैं। यदि तू अहं की सम्मान की रक्षा करना चाहेगा तो प्रभु प्राप्ति नही पावेगी और यदि प्रियतम - परमात्मा को प्राप्त करना चाहेगा तो अहं का परित्याग करना पड़ेगा।

  43. Kabir 12.43Open verse →

    दीन गंवाया दुनीं सौ, दुनी न चाली साथि। पाँइ कुहाड़ा मारिया, गाफिल अपणै हाथि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    जीवात्मा ने सांसारिक माया आकर्षणों में लिप्त रह कर प्रभु को भुला दिया किन्तु मरने पर वह सांसारिक प्रलोभन एक भी जीव के साथ नहीं जाते हैं। इस प्रकार जीवात्मा ने गाफ़िल होकर स्वयं अपने पैरों में कुल्हाड़ी मार ली है अपनी उन्नति का मार्ग अवरुद्ध कर लिया है।

  44. Kabir 12.44Open verse →

    यहु तन तौं सब वन भया, करंम भए कुहाड़ि। आप आप कूँ काटि हूँ, कहै कबीर विचारि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    यह सम्पूर्ण शरीर वन के समान है और उसको काटने के लिए जीव के कर्मों की कुल्हाड़ी प्रस्तुत है। कबीर दास जी विचार कर कहते है कि जीव ​अपने कर्मों की कुल्हाड़ी से अपने ही शरीर को काट रहा है। जीवन को नष्ट कर रहा है। विशेष―(१) तुलना कीजिए― “कोउ न कहु सुख दुख कर दाता। निज कृत कर्म भोग सुनु भ्राता॥" (२) रूपक अलंकार। शव्दार्थ―कुहाडि=कुल्हाडा।

  45. Kabir 12.45Open verse →

    कुल खोयां कुल ऊबरै, कुल राख्याँ कुल जाइ। राम निकुल कुल मेंटि लै, सब कुल रह्या समाइ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―सासारिक वैभवो का त्याग करके ही सार तत्व ब्रह्म की प्राप्ति संभव है और यदि सासारिक वैभवो की ही रक्षा का प्रयास किया गया तो ईश्वर-प्राप्ति असम्भव है इसलिए हे जीव।तू सांसारिक आकर्षणो से विरक्त होकर ब्रह्म से मिल ले क्योकि सारा संसार उसी मे समाया हुआ है। विशेष―कुल के दो अर्थ होने से यमक अलंकार।

  46. Kabir 12.46Open verse →

    दुनिया के धोखै मुवा, चलै जु कुल की काणि। तब कुल किसका लाजसी, जब ले धर्या मसांणि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    जो व्यक्ति कुल की मर्यादा आदि के प्रपंचो को लेकर चला वह सांसारिक भ्रमो का शिकार होकर मर गया। मृत्यु हो जाने पर जब शव को ले जाकर श्मशान की अपवित्र भूमि मे रख दिया जाता है तब किसका कुल लज्जित होता है? अर्थात् किमी का नहीं।

  47. Kabir 12.47Open verse →

    दुनियाँ भाँडा दुख का, भरी मुहांमुह भूप। अदया अलह राम की, कुरहै ऊँणीं कृप॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    यह संसार और कुछ नहीं केवल दुःखों का पात्र (स्थान) है जो नीचे से ऊपर तक अभावों से पूर्ण रूपेण भरा हुआ है। श्रेष्ठ राम और अल्लाह की कृपा के बिना बड़े-बड़े कोषागारों के रहते हुए भी जीवात्मा को अभावों का शिकार होना पड़ता है।

  48. Kabir 12.48Open verse →

    जिहि जेवणी जग वँधिया, तू जिनि वधैं कबीर। ह्वैसी आटा लूँण ज्यू, सोना सेवा शरीर॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    कबीरदास जी अपने को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि जिस माया की रस्सी से सारा संसार बंधा हुआ है उससे तू अपने को मत बाँध अर्थात् तू माया के प्रलोभन में न पड़ जिस प्रकार आटे की लोई को हाथों के मुक्के सहने पड़ते हैं उसी प्रकार तू भी कंचन के समान शुद्ध शरीर का होकर भी माया के वश में होकर सांसारिक यातना के प्रबल आघातों को बारम्बार सहेगा।

  49. Kabir 12.49Open verse →

    कहत सुनत जग जात है, विषै न सूजो काल। कबीर प्यालै प्रेम कै, भरि भरि पिवै रसाल॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    इस संसार के सभी प्राणी माया से मुक्त होने का उपदेश देते और सुनते हुए भी एक-एक कर उसी विषय वासना के मार्ग पर चलते जाते है उनमें उन्हें अपना विनाश दिखाई ही नहीं देता किन्तु कबीर ऐसे साधु व्यक्ति प्रभु-प्रेम सर के प्यालों को भर-भर कर पी रहे हैं और अमित आनन्द की प्राप्ति कर रहे हैं।

  50. Kabir 12.50Open verse →

    संदर्भ—माया के परिणाम को जान सुनकर के भी जीव उसके आकर्षक से मुक्त नहीं हो पाता है। कबीर हद के जीव सुँ हित करि भुखाँ न बोलि। जे लागे बेहद सूँ तिन सूँ अंतर खोलि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―कबीरदास जी कहते हैं, कि संसार के माया में लिप्त प्राणियो से प्रेम पूर्वक वार्तालाप नही करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जो असीम परमात्मा की प्राप्ति में सन्नद्ध हैं ऐसे प्रभु-भक्तो से अपने अन्तःकरण की बात भी कह देनी चाहिए।

  51. Kabir 12.51Open verse →

    कबीर केवल राम कहि, सुध गरीबी झालि। कूड़ बड़ाई कूड़सी, भारी पड़सी काल्हि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―कबीरदास जी कहते हैं कि हे जीव! तू राम नाम का स्मरण करते हुए अपनी गरीबी मे हो प्रसन्न रह। भवसागर मे डुवाने वाले मिथ्या सासारिक वैभवो मे यदि तू पड गया तो भविष्य मे तेरे ऊपर भारी विपित्त आवेगी और निश्चित रूप से तेरा पतन होगा।

  52. Kabir 12.52Open verse →

    सौंदर्भ―राम नाम को भुलाकर झूठे बडप्पन मे डूब जाने से जीव को बड़े कष्ट सहन करने पड़ते हैं। काया मंजन क्या करै, कपड़ धोइम धोइ। उजल हुआ न छूटिये, सुख नींदड़ीं न सोइ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―कबीरदास जी कहते हैं कि हे जीव! तू कपडो को धो-धोकर शरीर को स्वच्छ कर रहा है किंतु ऐसी सफाई से क्या लाभ? वास्तविक पवित्रता आंतरिक पवित्रता हैं। इस बाह्य स्वच्छता से संसार से मुक्ति नहीं होगी इसलिए सुख को निद्रा मे मत पड़ा रह।

  53. Kabir 12.53Open verse →

    ऊजल कपड़ा पहरि करि, पान सुपारी खाँहि। एकै हरि का नाँव बिन, बाँधे जमपुरि जाँहि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―जो व्यक्ति श्वेत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पान सुपारी खाकर अपना जीवन व्यतीत करते रहते हैं वे एक ईश्वर के नाम-स्मरण के बिना यमपुर के बंधनो मे जकड दिए जाते हैं।

  54. Kabir 12.54Open verse →

    तेरा सांगी को नहीं, सब स्वारथ बॅधी लोइ। मन परतीति न ऊपजै, जीव विसास न होइ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    हे जीव! जिनको तू अपना संगी साथी मानता है वे कोई तुम्हारे साथी नहीं है। वे सब तो स्वार्थ मे बंधे हुए हैं। जब तक मन मे ईश्वर की प्रतीति नही होती है तब तक जीवात्मा को मुक्ति नहीं प्राप्त हो सकती है।

  55. Kabir 12.55Open verse →

    सौंदर्भ―बिना ईश्वर को प्रतीति के जीवात्मा को मुक्ति नहीं मिलती। माँइ बिड़ाणी वाप बिड़, हम भी मॅझि बिड़ोह। दरिया केरी नाव ज्यूॅ, सजोगे मिलियाँह॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    बिड़ाणी=नष्ट होने वाली है। ​

  56. Kabir 12.56Open verse →

    संदर्भ―इस संसार में सभी प्राणी अचानक मिल जाते है और फिर विमुक्त हो जाते हैं। इत प्रधर, उत घर, बण जण आये हाट। करम किरांणां बेचि करि, उठि ज लागे बाट॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    जीवात्मा का घर तो ब्रह्म के पास ही है यह संसार तो उसके लिए परदेश है। लोग इस संसार मे कर्मों का व्यापार करने के लिए आते हैं और कर्मों का किराना―कर्म फल प्राप्त करके बेचकर सब उसी मार्ग का अवलम्बन करते हैं।

  57. Kabir 12.57Open verse →

    नाँन्हाँ काती चित दे महँगे मोलि बिकाइ। गाहक राजा राम है और न नेड़ा आइ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―हे जीवात्मा! तू खूब मन लगाकर सतकर्मों का पतला सूत कात जिससे तुझे अच्छी कीमत प्राप्त होगी। उस कर्म रूपी सूत को लेने वाले केवल राम ही हैं अन्य लोग तो पास आने का साहस भी करते हैं। शव्दार्थ―नान्हां=पतला। सूत=धागा कामं से तात्पर्य है। नेड़ा=समीप।

  58. Kabir 12.58Open verse →

    डागल ऊपरि दौड़णाँ, सुख निदणीं न सोइ। पूनै पाये द्यौंहड़े ओछी ठौर न कोइ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―हे मनुष्य! तुझको ऊबड़ खावड भूमि पर दौडना है कठिन साधना करनी है। सुख निद्रा मे अचेत हो कर मत सो। यह मानव शरीर अनेकानेक सुकर्मों के परिणाम स्वरूप प्राप्त हुआ है प्रभु-भक्ति के बिना इसे व्यर्थं मत खो। शव्दार्थ―डागल=ऊबड खाबड़ भूमि। द्यौंहडे=देवालय (यहाँ मानव शरीर से तात्पर्य है।)

  59. Kabir 12.59Open verse →

    मैं मैं बड़ी बलाइ है, सकै जो निकसी भाजि। कब लग राखौं हे सखी, रुई पलेटी आगि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―अहंकार बहुत ही भयानक वस्तु है|इसका शीघ्र ही विनाश कर देना चाहिए अन्यथा यह व्यक्ति को ही नष्ट कर देगा। जिस प्रकार रूईमे लिपटी हुई अग्नि कब तक सुरक्षित रह सकती है वह थोडे ही समय मे रूई को भस्मकर बाहर प्रकट हो जाती है उसी प्रकार अहंकार भी कब तक छिपा हुआ रहेगा एक न एक दिन वह प्रकट होवेगा ही।

  60. Kabir 12.60Open verse →

    मैं मैं मेरी जिनि करै,मेरी मूल बिनास। मेरी पग का षैषडा़,मेरी गल की पास॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―हे जीव तू अहंकार का परित्याग कर दे क्योकि अहंकार आत्मा के विनाश का कारण है। अहं भाव ही जीव के पैरो का बन्धन है और गले मे पढें हुए फाँसी के फन्दे के समान है।

  61. Kabir 12.61Open verse →

    कबीर नाव जरजरी,कूडे खेवणहार। हलके हलके तिरि गए,बूडे तिनि सिर भार॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―कबीर दास जो कहते है कि जीवन रूपी नाव अत्यन्त जजंर है जोर उसका खेने वाला नाविक अत्यन्त कूडा है,बेकार है। ऐमी अवस्था मे जो व्यक्ति हल्के है जिनके ऊपर पापो का वोझा कम है वे तो संसार सागर से पार उतर गए और जिनके सर पर पापो का वोझा लदा हुआ था ये उसी भव सागर मे ढ़ूब गए।