कबीर दास जी रहते हैं कि शरीर रूपी भवन को प्रत्येक ईंट में लेप लगा दी गई है जिससे शिघिन होकर कर यह भवन उड़ गया है। इसलिए चिरन्तन प्रभु रूपी कारीगर से प्रेम कर जिसमें दूसरी बार वह शरीर रूपी भवन फिर न उड़ जाय। फिर न जाय। शब्दार्थ—प्रोतिड़ो=प्रेम। कबीर मन्दिर लाष का, जड़िया हीरै लालि॥
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ—शरीर के नष्ट होने पर इसका बनाने वाला कारीगर इसकी मरम्मत नहीं करता वह बेकार ही हो जाता है। कबीर देखत ढहि पड़या, ईंट भईं सैंवार। करि चिजारा सौ प्रीतिड़ी, ज्यूं ढहै न दूजी बार॥
Kabir 12.18
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
ईश्वर से प्रेम करने पर मानव शरीर आयागमन से मुक्त होकर कमरता को प्राप्त होता है।