हे जीव! जिनको तू अपना संगी साथी मानता है वे कोई तुम्हारे साथी नहीं है। वे सब तो स्वार्थ मे बंधे हुए हैं। जब तक मन मे ईश्वर की प्रतीति नही होती है तब तक जीवात्मा को मुक्ति नहीं प्राप्त हो सकती है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
तेरा सांगी को नहीं, सब स्वारथ बॅधी लोइ। मन परतीति न ऊपजै, जीव विसास न होइ॥
Kabir 12.54
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
बंधो=बंधे हुए। लोई=लोग।