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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

डागल ऊपरि दौड़णाँ, सुख निदणीं न सोइ। पूनै पाये द्यौंहड़े ओछी ठौर न कोइ॥

Kabir 12.58

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Translations & commentaries(2)

Sūtra Translation

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―हे मनुष्य! तुझको ऊबड़ खावड भूमि पर दौडना है कठिन साधना करनी है। सुख निद्रा मे अचेत हो कर मत सो। यह मानव शरीर अनेकानेक सुकर्मों के परिणाम स्वरूप प्राप्त हुआ है प्रभु-भक्ति के बिना इसे व्यर्थं मत खो। शव्दार्थ―डागल=ऊबड खाबड़ भूमि। द्यौंहडे=देवालय (यहाँ मानव शरीर से तात्पर्य है।)

Bhāṣya Commentary

Bhāṣyahi.wikisource· HI

जीवन को प्रभु-भक्ति मे ही लगाना चाहिए, व्यर्थं मे नही खोना चाहिए।