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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

सौंदर्भ―राम नाम को भुलाकर झूठे बडप्पन मे डूब जाने से जीव को बड़े कष्ट सहन करने पड़ते हैं। काया मंजन क्या करै, कपड़ धोइम धोइ। उजल हुआ न छूटिये, सुख नींदड़ीं न सोइ॥

Kabir 12.52

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Translations & commentaries(3)

Sūtra Translation

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―कबीरदास जी कहते हैं कि हे जीव! तू कपडो को धो-धोकर शरीर को स्वच्छ कर रहा है किंतु ऐसी सफाई से क्या लाभ? वास्तविक पवित्रता आंतरिक पवित्रता हैं। इस बाह्य स्वच्छता से संसार से मुक्ति नहीं होगी इसलिए सुख को निद्रा मे मत पड़ा रह।

Bhāṣya Commentary

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―शरीर और कपडो की शुद्धता से हो आत्मा पवित्र नहीं होती। मन की शुद्धि ही वास्तविक शुद्धि है। ​

Padārtha Word-meaning

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―मंजन=स्नान। छुटिए=मुक्त होना।