जिस प्रकार कुम्हार की मिट्टी को मलते समय अनेकों लातें खानी पड़ती है ठीक उसी प्रकार मनुष्य को भी नाना प्रकार को यातनायें भोगनी पढ़ती हैं इस लिए है जीव यदि तू इस जन्म में सावधान नहीं हुआ तो पुनः इस प्रकार का स्वर्णिम अवसर मिलना मुश्किल है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
माटी मलणि कुंभार की घणी सहै सिरि लात। इहि औसरि चेत्या नहीं, चूका अब की घात॥
Kabir 12.29
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
जो मनुष्य इस संसार में आकर आवागमन के चक्र से छूटने के लिए प्रयास नहीं करता वह फिर मुक्त नहीं हो पाता है।