―कबीरदास जी कहते हैं, कि संसार के माया में लिप्त प्राणियो से प्रेम पूर्वक वार्तालाप नही करना चाहिए। इसके अतिरिक्त जो असीम परमात्मा की प्राप्ति में सन्नद्ध हैं ऐसे प्रभु-भक्तो से अपने अन्तःकरण की बात भी कह देनी चाहिए।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ—माया के परिणाम को जान सुनकर के भी जीव उसके आकर्षक से मुक्त नहीं हो पाता है। कबीर हद के जीव सुँ हित करि भुखाँ न बोलि। जे लागे बेहद सूँ तिन सूँ अंतर खोलि॥
Kabir 12.50
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
―हद के जीव सू=सांसारिक मनुष्य से बेहद=असीम, निस्सीम।