कबीरदास जी अपने को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि जिस माया की रस्सी से सारा संसार बंधा हुआ है उससे तू अपने को मत बाँध अर्थात् तू माया के प्रलोभन में न पड़ जिस प्रकार आटे की लोई को हाथों के मुक्के सहने पड़ते हैं उसी प्रकार तू भी कंचन के समान शुद्ध शरीर का होकर भी माया के वश में होकर सांसारिक यातना के प्रबल आघातों को बारम्बार सहेगा।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
जिहि जेवणी जग वँधिया, तू जिनि वधैं कबीर। ह्वैसी आटा लूँण ज्यू, सोना सेवा शरीर॥
Kabir 12.48
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
माया के बंधन में पढ़ने से जीव की मुक्ति नहीं होती है। उसे आवागमन, के चक्र में पड़कर सांसारिक यातनाएँ सहनी पड़ती हैं।
Padārtha — Word-meaning
जेवढी = रस्सी, माया बंधन। लूंण = आटे की लोई।