―हे जीवात्मा! तू अपनी शरीर रूपी केंचुली को वासना से मत कलकित कर। काल रूपी शिकारी दिन प्रति दिन तुझे मार रहा है। कबीर दास जी ने तो अपनी रुचि ईश्वर भक्ति की ओर मोड दी है। हे प्राणी! तू भी उसी औषधि का सेवन कर।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ―शरीर का भविष्य अनिश्चित है। काँची कारी जिनि करै, दिन दिन बधै बियाधि। राम कबीरे रुचि गई, याही ओषदि साधि॥
Kabir 12.40
Audio
Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
―काँची=केचुली। वियाधि=बहेलिया, शिकारी।