कबीर दास जी कहते हैं कि अज्ञान रूपी रात्रि में माया के स्वप्न देखने के कारण पारस्त्ररूप ब्रह्म और जीव में अन्तर स्थापित हो गया। यही कारण है कि अज्ञान की सुप्तावस्थायें मुझमें और परमात्मा में भेद हो जाता है और ज्ञान की जागृता वस्था में कोई भेद नहीं रहता एकरूपता स्थापित हो जाती है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
कबीर सुपनै रैनिकै, पारस जीय में छेक। जे सोऊँ तौ दोइ जणां, जे जागू तौ एक॥
Kabir 12.23
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
ब्रह्म और जीव का भेद माया के कारण ही होता है। ज्ञान प्राप्त हो जाने पर यह भेद समाप्त जो जाता है।
Padārtha — Word-meaning
छेक = भेद।