―प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार ढोल नगाड़ा डुगड्डगी, शहनाई तथा मेटी को बजाते हुए मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। उनका वैभव और ऐश्वर्य मृत्यु को रोकने मे समर्थ नहीं हो पाता है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ―सासारिक वैभव थोडे दिनों का हो होता है मरणोपरात उसका चिह्न भी नहीं रह जाता है। अतः ईश्वर का नाम स्मरण कर जीवन को सार्थक करना चाहिए। ढोल दमामा दुड़ बड़ी, सहनाई संग मेरि। औसर चल्या बजाइ करि, है कोइ राखै फेरि॥
Kabir 12.3
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
―दुडवडी = ढुगढगी।