कबीर दास जी कहते हैं कि हे जीव! तेरे पास हृदय रूपी खम्भा तो एक है और उस खम्भे में बाँधने के लिए दो हाथी प्रभु-भक्ति और अहं हैं। वे दोनों एक ही खम्भे से कैसे बांधे जा सकते हैं। यदि तू अहं की सम्मान की रक्षा करना चाहेगा तो प्रभु प्राप्ति नही पावेगी और यदि प्रियतम - परमात्मा को प्राप्त करना चाहेगा तो अहं का परित्याग करना पड़ेगा।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ―लोभ और दर्पं से ही प्रभु भक्ति मे बाधा पड़ती है। खंभा एक गइंद दोइ, क्यूं करि वंधिसि बारि। मानि करै तौ पीव नहीं, पीव तौ मानि निवारि॥
Kabir 12.42
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
प्रभु-भक्ति और अहं की भावना दोनों साथ-साथ नहीं रह सकते हैं।
Padārtha — Word-meaning
गइद = गयंद = हाथी।