―कबीरदास जी कहते हैं कि ईश्वर भक्ति के बिना इस संसार मे जीवित रहना घृणा स्पद है। मनुष्य को प्रभु भक्ति करनी ही चाहिए क्योंकि यह शरीर धुए के महल के समान हैं जिसके बिगड़ने मे तनिक भी देर नही लगती है। विशेष― (१) उपमा अलंकार (२) ‘धुआँ कैसे धौलहर देखि तू न भुलिरे।’ विनय पत्रिका मे तुलसी ने भी इसका प्रयोग किया है। शव्दार्थ―घ्रिग=घिषकार। घौलहर= महल। जात=नष्ट होते |
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
कबीर हरि की भगति बिन, धिग जीवरण संसार। धुँवा केरा धौलहर, जात न लागै बार॥
Kabir 12.27
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―प्रभु भक्ति के बिना जीवन भारण व्यर्थ है।