―कबीरदास जी का कहना है कि यह शरीर रजी सार्थवाह है जो आत्मा रूपी धन को लेकर चल रहा है। इसके साथ पाच चोर (काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह) उस धन को चुराने के लिए चल रहे हैं। दस छिद्रो ( ५ कर्मेन्द्रियाँ और ५ ज्ञानेन्द्रियाँ) के होने के कारण इस शरीर रूपी कारवाँ की दशा और भी शोचनीय हो रही है यमराज इस दुर्गं को नष्ट करने के लिए इस पर आक्रमरण अवश्य करेगा अतः ईश्वर का स्मरण करना चाहिए तभी रक्षा हो सकती है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
कबीर पटण कारिवाँ, पांच चोर दस द्वार। जय राँणों गढ़ भेलिसी, सुमिरि लै करतार॥
Kabir 12.7
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
―पाटण-नगर, शरीर। कारिवाँ=कारवाँ, सार्थवाह। पच चोर=काम क्रोध, मद, लोभ, मोह। दसद्वार=दस छिद्र (दस इन्द्रिया=५ कर्मेन्द्रियाँ,५ ज्ञानेन्द्रियाँ। जमरा=यमराज। भेलिसी= नष्ट करेगा।