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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

​⁠संदर्भ―ईश्वर के नाम स्मरण के बिना इस शरीर को नानाविधि यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं। यह तन काचा कुंभ है, लियां फिरै था साथि। ढ़बका लागा फूटि गया, कछू न आया हाथि॥

Kabir 12.39

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Translations & commentaries(2)

Sūtra Translation

Sūtrahi.wikisource· HI

कुम्भकार का कच्चा घड़ा जिसे वह हाथ में लिए रहता है कोमल होने के कारण तनिक सी चोट लगने के कारण फूट जाता है और अस्तित्वहीन होने के कारण फिर हाथ मे कुछ नहीं रहता उसी प्रकार इस शरीर का भविष्य भी अनिश्चित होता है यह भी किसी समय नष्ट हो सकता है और नष्ट होने पर कुछ भी हाथ में नहीं आता है।

Padārtha Word-meaning

Padārthahi.wikisource· HI

―ढवका=हल्की सी चोट।