Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Chapter 4
ग्यान विरह कौ अंग
ग्यान विरह कौ अंग
37 verses
दीपक पावक आँखिया, तेल भी आँण्या संग। तीन्यूँ मिल करि जोइया, (तब) उडि उड़ि पड़े पतंग॥
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जीवात्मा ज्ञान की ज्योति से और भक्ति रूपी स्नेह से सम्पन्न हो गया। अब वासना रूपी पतंगे आत्मा जल-जल कर नष्ट होने लगे।
मार्या है जे मरेगा, बिन सर थोथी भालि। पड्या पुकारै ब्रिच्छ तरि, आजि मरै कै काल्हि॥
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शब्द रूपी भाले से आहत प्राणी अब संसार से विलग होकर, पृथक होकर जीवन यापन करता है। वह सद्गुरु के आश्रय में ब्रह्म का स्मरण कर रहा है। वह शीघ्र ही संसार की व्यथाओं से ऊपर उठ जायगा।
हिरदा भीतरि दौं बलैं, घूँवा न प्रकट होइ। जाकै लागी सो लखै, कै जिहि लाई सोइ॥
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हृदय में प्रेम-विरह की अग्नि जल रही है परन्तु उसके लक्षण वाधतः नहीं प्रकट हो रहे हैं। इस अग्नि का वही अनुभव करता है, जिसके अन्तस में यह अग्नि लगी है या वह जिसने इस अग्नि को जाग्रत किया है।
भल ऊठी भोली जली, खपरा फूटिम फूटि । ओगी था सो रमि गया,आसणि रही विभूति ॥
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भल अग्नि मे शरीर रुपी भोली जल गयो और खरर फूट गया । योगी ब्रह्म मे रम गया और आगन पर केवल वस्त्र अवशेष रह गई ।
अग्नि जु लागी नीर मैं, कँदू जलिया भारि । उतर दषिण के पंडिता, रहे बिचारि बिचारि ॥
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ज्ञान की अग्नि के लगते हो माया का जल और उसके सहायत तत्व विनष्ट हो गये । इस आश्चर्यजनक कृत्य को उतर दक्षिण के पण्डित देखते हो रह गय ।
संदर्भ - ज्ञान की अग्नि के लगते हो माया और माया के तत्व विनसष्ट हो गये । दौ लागी सायर जल्या, पंपो बैठे आइ । दाधी देह न पालवैं, सतगुर गया लगाय ॥
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ज्ञान को अग्नि के प्रज्यसित हो जाने पर माया का सागर भहमो भूत हो गया ।आत्मा रुपी पक्षी जो माया रुपी सागर के निरट पे , अब निरिचन्त हो गये । ज्ञानागिन से प्रदग्ध देह भौतिक ददद मे है । यह अग्नि सतगुरु ने नना दिया । शब्दर्थ - दौ = दावाग्नि । मायर = सागर पंपो = रधो । दापी=दघ । पालयै=चड़ेतौ है । गुरु दाधा चेला जल्या, चिरटा लागी आगि
विणका बपुड़ा ऊचरया ,गलि पुरे फै लागी ॥
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गुरु ने ज्ञान को अग्नि प्रज्वलित की और शिष्य विरह (ज्ञान विगह)को अग्नि मे जल गया। तिनके के समान हल्की, पाप के भार से मुक्त आत्मा को उन्मपित हो गया और वह पूर्ण ब्रह्म से मिल कर एकाकर हो गया।
अहिडी दौ लाइया,मृग पुकारे ऱोई। जा वन मे क्रीला करी,दाभत है वन सोइ ॥
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सतगुरु= अहेरी ने ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित की,संसार रूपी वन गया और इस माया के वन मे वितरण करने वाले इन्द्रिय रूपी मृग रो उठे। जिस वन मे मृग किड़ा करते थे, अब वह वन जल गया। इस लिए मृग दुखि हो गये।
पारगी मंहि प्रजली, भई अप्रबल आगि। वहती खलिता रह गई,मंल्ल रहे जल त्यागि॥
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मया के सागर मे गानागनि लगी तो पाया कि महयक तरन विनष्ट हो गये और लारमा रूपी नर्दश्थ गया के जल को धोद कर अलग हो गई।
समंदर सागी भागि, नदियां जलि कोइला भईं। देन्पि घपिरा जगि मंधी रुपां घदी गई॥
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भव सागर में ज्ञान की अग्नि लग गई और फलतः माया की सहायक तत्व विनष्ट हो गये। कबीर ने चेतन होकर देखा कि मछली शब्द रूपी वृक्ष पर आसीन है।
कबीर तेज अनंत का मानौं ऊगी सूरज सेखि। पति सँगि जागी सुंदरी, कौतिग दीठा तेणि॥
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ब्रह्म का तेज, प्रकाश मान स्वरूप अनन्त है। वह प्रकाश का समूह मानो सूर्य की श्रेणियाँ एक स्थान पर उदित हुई हो, आत्मा रूपी सुन्दरी ने जाग्रत होकर उस वैभव को देखा, प्रकाश नारायण के दर्शन किये।
कौतिक दीठा देह विन, रवि खसि विना उजास। साहिब सेवा माहिं है, बेपरवाही दास॥
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प्रबुद्ध आत्मा निराकार ब्रह्म के दर्शन किए वह ब्रह्म रवि एवं शशि के प्रकाश के अभाव में भी प्रकाश मान है। वह स्वयंम् प्रकाश है। प्रभु के दर्शन सेवा में रत सेवक को ही प्राप्त होते हैं।
पारब्रह्म के तेज का, कैसा है उसमान। कहिबे कूं सोभा नहीं देखया ही परबान॥
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पर ब्रह्म के तेज,स्वरूप किस प्रकार का है? यह अकथनीय है,अवर्णनीय है। वह अव्यिंजना से परे है,केवल अनुभव करने योग्य है।
अगम अगोघर गमि नहीं,तहाँ जगमगै जोति। जहाँ कबीरा बंदिगी,(तहां)पाप पुन्य नहीं छोति॥
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निर्गुण निराकार ब्रह्म अगम है, अगोचर जहाँ ब्रह्म की ज्योति जगमगाती वहाँ किसी की गति नही है वह पाप-पुण्य कि सीमाओ से परे है। ऐसे ही ब्रह्म ही समक्ष कबीर की प्रार्थना प्रस्तुत होते है।
हदे छाँडि बेहदि गया,हुआ निरंतर बास। केवल ज फूल्या फूल बिन,को निरपै निज दास॥
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कबीर कहने हे कि मेरा मन मधुकर निगुंसा ब्रह्म पर घनुगन होकर उसी मे निरन्तर दम गया है । माया रूपी जन के मंहार्द मे परे विरुपिमान निर्गुण ब्रह्म की दर्शन कोई ग्रहण गाहक ही मुक्ता हे।
अंतरि कवल प्रक्रासिया, ब्रहा तहाँ होइ। मन भवरा तहां लुबाधिया, जांरौगा जन कोइ॥
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हृदय मे कमल प्रकशित हो गया और उसमे ब्रह्म का निवास है। मन रूपी भ्रमर उस पर लुब्ध हो गया। विरला ही साधक इस रहस्य हो जान सकेगा।
संदार्भ— हृदय प्रदेश मे व्रह्म क वास है। मन भ्ंवरा वहा लुब्ध हो गया है। सायर नाही सीप बिन, स्वांति ब्ँद भी नांहि। कबीर मोती नीपजैं सुन्नि सिपर गढ मांहि॥
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कबीर कह्ते है कि न सागर है, न सीप है न स्वाती का बूंद् है। फिर भी शून्य शिखर गढ मे निर्गुण ब्रह़्म रूपी मोती की उप्लब्धि हो रही है।
घट मांहैं औघट लह्या, औघट माहैं घाट। कहि कबीर परचा भया, गुरू दिखाई बाट॥
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कबीर कह्ते है कि सतगुरु की कृपा से, सतगुरु द्वारा प्रतिदिन मार्ग पर चलकर घट मे ही ब्र्ह़्म के दर्शन हुए और ब्रह्म मे ही अपनी स्थिति दृष्टि गत हुई।
सूर समांणां च्ंद् में दहूं किया घर एक। मनफा च्य्ंता तय भया, पछू पूरवला लेख॥
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शरीर मे प्रेम के जाग्रत होते ही अनंत प्रेम,ओर अनन सम्बन्ध प्रकट हो गया इस प्रकार संगम मिट गया और प्रिय से एकात्मकता स्थापित हो गया ।
प्यंजर प्रेम प्रकासिया, अंतरि भया उजास। मुख कस्तूरी महमहीं, बाँणी फूटी वास॥
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जब से प्रेम जाग्रत हुआ अन्तस उज्ज्वल हो गया और ब्रह्म रूपी कस्तूरी से सुवासित वाणी प्रस्फुटित हुई।
मन लागा उन मन्न सौं, गगन पहुँचा जाइ। देख्या चंद बिहूँणां, चांदिणाँ, तहाँ अलख निरंजन राइ॥
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संसार से उन्मुक्त होकर मन उनमनी अवस्था में पहुँच कर ब्रह्माण्ड में जा पहुँचा। वहाँ पर उसने स्वयं प्रकाश, प्रकाश पुन्ज ब्रह्म के दर्शन किए।
संदर्भ—मन ने उन्मनी अवस्था में ब्रह्मानुभूति प्राप्त की। मन लागाउन उन मन सौ, उन मन मनहिं विलग। लूँण बिलगा पाणियाँ, पांणीं लूँ बिलग॥
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पानी से ही हिम का निर्माण होता है और हिम पुनः घुलकर पानी के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इसी प्रकार ब्रह्म से उद्भूत होकर आत्मा ब्रह्मकार हो जाती है। आत्मा और परमात्मा का एकाकार होना अनियर्वाचनीय है
संदर्भ—मन ब्रह्म से मिलकर एकाकार हो गया। भली भई जु मैं पड्या, गई दशा सय भूलि । पाला गलि पांणी भया, दुलि मिलिया उस कृति॥
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सुरति निरति मे प्रविष्ट हो गई, और निरति के साथ मिलकर एकाकार हो गई। सुरति और निरति का परिचय हो जाने के पश्चात् ब्रह्म के रहस्य का द्वार स्वात: उद्घाटित हो गया।
आया था संसार में, देषरग कौं बहु रूप। कहै कबीरा संत हौ, पढ़ि गया नजरि अनुप ॥
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संसार मे माया के बहुरंग रूप को देखने के लिए आया था, परन्तु हे सन्त-जन अनुपम तत्व जब से दृष्टिगत हो गाया, तब से माया की समस्त दशाओ को मैं भूल गया।
अंक भरे भरि भेटिया, मन में नाहीं धीर। कहै कबीर ते क्यू मिले,जब लग दोइ सरीर॥
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प्रेमाधिक्य के कारण प्रिय का बडी व्यग्रता के साथ आलिगन विध, दोनो शरीर एकाकार हो गए। कबीर कहते हैं जब तक प्रेम तत्व को प्रबलता नही होती हे तब तक दोनो एकाकार केसे हो सकते हे?
सचुपाया सुख ऊपना, अरु दिल दरिया पूरि। सकल पाप सड़जैं गये, जब जाई मिल्या हजूरि॥
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कबीर दास कहते हैं कि जब से प्रभु के प्रत्यक्ष दर्शन् हुए तब से हृदय मे शन्ति का साम्राज्य स्थापित हो गाया और समस्त पाप सहज रूप से विनष्ट हो गए ।
धरती गगन पवन नहीं होता, नहीं तोया, नहीं तारा। तब हरि हरि के जन होते, कहै कबीर विचार॥
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जिस दिन यह संसार न होता हाट और वस्त्र न होते, सांसारिक व्यापार न होते कबीर कहते हैं कि उस दिन भी राम और राम के भक्त इस संसार में होते।
थिति पाई मन थिर भया, सतगुरु करी सहाइ। अनिन कथा तनि आचरी, हिरदै त्रिभुवन राइ॥
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सदगुरु की कृपा से मन स्थिर हो गया और हरि की यज्ञगाथा की साधना मे मन अनुरक्त हो गया, तब से हृदय मे भगवान के दर्शन हुए।
हरि संगति सीतल भया, मिटी मोह की ताप। निस बासुरि सुख निध्य लह्या, जब अतरि प्रगट्या आप॥
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हरि के शरण मे जाते ही समस्त पाप विनष्ट हो गए। मोह की ज्वाला शान्त हो गाई जब से ब्रह्मा के दर्शन हुए तब से दिन-रात सुख की निधि प्राप्त हो गई।
तन भीतरि मन मानियाँ, बाहरि कहा न जाइ। ज्वाला तैं फिर जल भया, बुझी बलंती लाइ॥
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हृदय में ही मन मुग्ध होकर सीमित हो गया। अब यह बाहर कही नहीं जाता है। मोह की ज्वाला शान्त हो गई और अग्नि पीतल हो गई।
तत पाया तन बीसर्या, जब मन घरिया ध्यान। तपनि गई सीतल भया, जब सुनि किया असनान॥
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जब से मन में प्रभु का ध्यान हुआ, तब से मन में शान्ति स्थापित हुई। ब्रह्म तत्व की प्राप्ति हुई और तन की दशाएंँ भूल गया। समस्त ताप नष्ट हो गए और शून्य सरोवर में स्नान किया।
जिनि पाया तिनि सू गह गह्या रसनां लागी स्वादि। रतन निराला पाईया, जगत ढंडौल्या बादि॥
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जिन्होंने खोज की उन्हें हरि रूपी हीरा मिला और जिसने पाया उसे भली-भाँति ग्रहण किया। मन में जिह्वा में रामनाम रूपी स्वाद लग गया। मैंने तो अद्भुत रत्न प्राप्त कर लिया अब संसार में कौन भटकता फिरे।
संदर्भ—संसार सागर में भटकते-भटकते हरि रूपी हीरा प्राप्त हो गया। कबीर दिल स्यावति भया, पाया फल संम्रथ्य। सायर मांहि ढंढोलतां, हीरै पडि गया हथ्य॥
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जब से मन में धैर्य और शान्ति स्थापित हो गई तब में हरि रूपी हीरा सम्प्राप्त हो गया। संसार सागर में खोजते खोजते हरि रूपी हीरा प्राप्त हो गया ।
संदर्भ—संसार सागर में हरि हीरा प्राप्त हो गया । जब मैं था तब हरि नहीं,अब हरि हैं मैं नांहि । सब अँधियारा मिटि गया जब दीपक देख्यां माहि ॥
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जब तक अहं था तब तक मैं हरि को नहीं प्राप्त कर पाया। अब तो हरि ही हैं मैं नही हूँ, जब से ह्रदय मे स्वय प्रकाश के दर्शन हुए तब से समस्त ताप और पाप नष्ट हो गए ।
जा कारणि मैं ढूंढता,सनमुख मिलिया आइ। धन मैली पिव ऊजला,लागि न सकौं पाइ॥
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जिसको मैं ढूंढत फिरता था वह सन्मुख मिल गया,परन्तु पाप से पंकिल आत्मा रूपी प्रिय स्त्री प्रिय के चरणो का स्पर्श कैसे करे।
जा कारणि मैं जाइ था,सोई पाई ठौर। सोई फिरि आपण भया,जासू कहता और॥
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जिसके खोज मे मैं भटक रहा था वह अपने स्थान पर प्राप्त हो गया और जिसे मैं विलग समझता था वही अभिन्न हो गया।
कबीर देख्या एक अंग,महिम कही न जाइ। तेज पुंज पारस धरणीं,नैनू रहा समाइ॥
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एक अंग=एक निष्ठ होकर धरणी=स्वामी।