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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Chapter 9

हैरान कौ अंग

हैरान कौ अंग

2 verses

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  1. Kabir 9.1
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    पंडित सेती कहि रहे, कह्यां न मानै कोइ। ओ अगाध एका कहै, भारी अचिरज होइ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―मैं यदि पण्डितो से उस परमात्मा के अद्भुत स्वरुप का वर्णन करता हूँ तो ये उसका विश्वास ही नही करते। और यदि मैं उनसे यह कहता है कि ब्रह्म असीम, अगाध, और एक है तो सभी पण्डित आश्चर्य करते हैं।

  2. Kabir 9.2
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    ⁠सन्द्र्भ――ईश्वर के विषय मे जो कुछ भी कहा जाय उसी पर लोगो को अश्चय् होता है। बसै अपण्डी पण्ड में, तागति लषै न कोइ। कहै कबीरा संत हौ, घडी अचंभा मोहि॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―निराकार ब्रह्म इसी शरीर मे निवास करता है किन्तु फिर भी इस बात पर कोई ध्यान नही देता हे उनकी गति को कोई देख नहीं पाता है। कबीर दास जी कहते हैं कि मुझे बडा आश्चर्य इस बात पर होता है कि लोग साधना के द्वारा उसे प्राप्त क्यो नही कर पाते है।