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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Chapter 16

माया कौ अंग

माया कौ अंग

32 verses

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  1. Kabir 16.1
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    जग हट वाड़ा स्वाद ठग, माया वेसों लाइ। राम चरन नीकों ग्रही, जिनि जाइ जनम ठगाई॥

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    ―यह संसार एक बड़ा बाजार है जिसमे इंद्रियो के स्वाद रूपी ठग हैं और माया रूपी वेश्या भी जीवको ठगने का प्रयास करती है। ऐसी अवस्था मे हे जीव! यदि तू दृढतापूर्वक ईश्वर के चरणो का सहारा लेगा तब तो ठीक है नही तो इस संसार ही बाजार से विषय-वासना और माया के द्वारा बिना ठगे बच नहीं सकते हो। शव्दार्थ―वेसा=वेश्या। विशेष―रूपक अलकार।

  2. Kabir 16.2
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    कबीर माया पापणीं, फंध ले बैठी हाटि। सब जग तौ फंधै पड्या, गया कबीरा काटि॥

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    ―कबीर दास जी कहते हैं कि माया अत्यन्त पापिनो है वह अपने हाथ फंदा लेकर सारे संसार के प्राणियों को फंसाने के लिए बैठी है। सारा संसार तो उस माया के फदे मे पड गया है अर्थात् सत्र पर माया का प्रभाव पड चुका है किन्तु कबीर ऐसे भक्त ही उस माया के फन्दे को काटकर उससे बाहर हो जाते हैं उसकी पकड़ में नहीं आते हैं।

  3. Kabir 16.3
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    कबीर माया पापणीं, लालै, लाया, लोग। पूरी किनहूॅ न भोगई, इनका ईंहै विजोग॥

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    ―कबीरदास जी कहते हैं कि माया अत्यन्त पापिनी है यह संसार के समस्त प्राणियो मे अपने पाने के लालसा को जागृत कर देती है किन्तु वह गृहबहू नही है जिसका एक ही व्यक्ति उपभोग कर सके वह तो वेश्या है उसका पूर्ण ​उपभोग कोई व्यक्ति नहीं कर पाता है। थोड़े समय के लिए माया सबको आकर्षित कर लेती है फिर उससे सबका वियोग हो जाता है। यही ससार का दुःख है। विशेष―रूपक अलकार शव्दार्थ―लालै लाया=अपनी प्राप्ति की आशा जागृत करना।

  4. Kabir 16.4
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    कबीर माया पापणी, हरि सूॅ करै हराम। मुखि कड़ियाली कुमति की, कहण न देई राम॥

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    ―कबीर दास जी कहते हैं कि पापी माया अत्यंत दुष्टा है यह जीव को ब्रह्म से मिलने नहीं देती है। यह जीव के मुख से कड़वी बातो को कहवाती रहती है और राम नाम (ब्रह्म) का उच्चारण नहीं होने देती। शब्दाथ―कड़ियाली=कड़वी।

  5. Kabir 16.5
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    संदर्भ―माया ही प्रभु-भक्ति में बाधक है। जाँणौं जे हरि कौं भजौं, मो मनि मोटी आस। हरि विचि घाले अन्तरा, माया बड़ी बिसास॥

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    ―प्रत्यक्ष मे ऐसा लगता है कि मैं परमात्मा का बहुत भजन करता हूँ किन्तु मेरे मन मे सासारिक आशाएं अत्यन्त तीव्रता से भरी हुई है। किन्तु यह माया अत्यत विश्वासघातिनी है यह तो जीव और ब्रह्म के बीच अन्तर डाल देती है। शव्दार्थ―मोटी आस=विषयो की तीव्र तृष्णा। घालै=डालना। विसास=विश्वासघातिनी।

  6. Kabir 16.6
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    कबीर माया मोहनी, ‘मोहे जांण सुजांण। भागां ही छूटै नहीं, भरि भरि मारै बांण॥

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    ―कबीरदास जी कहते हैं कि माया इतनी आकर्षक है कि बडे-बडे ज्ञानी एवं चतुर व्यक्ति भी इसके सम्मोहन से बच नहीं पाते हैं और यदि कोई इसके प्रभाव से भागकर भी बचना चाहे तो यह इतना तान तान कर मोहक बाण चलाती है कि व्यक्ति के ऊपर बाणो का प्रभाव पड़ हो जाता है। लोग माया जाल में फंस ही जाते हैं।

  7. Kabir 16.7
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    कबीर माया मोहनी, जैसी मीठी खाँण। सतगुरु की कृपा भई, नहीं तौ करती माँड॥

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    ―कबीरदास जी कहते हैं कि माया खाँड के समान मीठी और मोहक है। सबको अपनी ओर आकर्षित करने वाली है। सतगुरु की कृपा हो गई इसलिए मैं इसकी चपेट से बच गया हूँ अन्यथा तो यह मुझे बर्बाद करके ही दम लेती।

  8. Kabir 16.8
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    कबीर माया मोहनी, सब जग घाल्या घाँणि। कोई एक जन ऊबरै, जिन तोड़ी कुल की कांणि॥

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    ―कबीरदास जी कहते हैं कि माया इतनी जादूगरनी है कि सम्पूर्ण संसार को अपने फंदे मे डालकर तेवो को घानी के समान पीस डालती है। कोई बिरला व्यक्ति हो इसके प्रभाव से बच सकता है जो सांसारिक मान-मर्यादाओ को छोडकर परम्पराओ का परित्याग कर देते हैं।

  9. Kabir 16.9
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    कबीर माया मोहनी, माँगि मिलै न हाथि। मनह उतारी झूठ करि, तब लागो डोलै साथि॥

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    कबीरदास जी कहते हैं कि माया ऐसी मोहक है कि जो इसको हाथ फैलाकर माँगते हैं उनको यह नहीं प्राप्त होती है किन्तु जिन भक्तो और साधको ने इसको मिथ्या समझ कर अपने मन से निकाल दिना है उनके पीछे यह डोलती रहती है।

  10. Kabir 16.10
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    माया दासी सन्त की, ऊँभी देइ असीस। बिलंसी अरु लातौं छड़ी, सुमिरि सुमिरि जगदीस॥

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    ―माया सन्तो की सेवा करने वाली दासी है जो खड़ी हुई उनकी आज्ञा का पालन करती रहती है। सन्त लोग ईश्वर का स्मरण करते हुए इसका उपभोग भी करते हैं और इसका तिरस्कार कर लातो से मार-मार कर ठुकराते भी हैं किन्तु अन्य लोगो को यह दुख ही देती है।

  11. Kabir 16.11
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    सदर्भ―माया सन्तो की तो सेवा करती है और अन्य व्यक्तियों को दुख देती है। ​ माया मुई न मन मुवा, मरि मरि गया सरीर। आसा त्रिवणां नाँ मुई, यों कहि गया कबीर॥

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    ―कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार के आवागमन के चक्र के कारण शरीर तो बार-बार मरता है किन्तु माया के आकर्षण और मन की विषयों के पीछे की दौड़ समाप्त न हुई, और कभी सांसारिक आशाओ कामनाओ और तृष्णा का ही अन्त हुआ।

  12. Kabir 16.12
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    संदर्भ―माया, मन, आशा और तृष्णा की अमरता की ओर संकेत है। आसा जीवै जग मरै, लोग मरे मरि जाइ। सोइ मूवे धन संचते, सो ऊबरे जे खाइ॥

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    =इस संसार मे लोग एक-एक करके मरते जाते हैं और इस प्रकार सारा संसार ही मरताजा रहा है किन्तु फिर भी आशा जीवित ही बनी है। लोगो के मरने पर भी आशा उनका साथ नहीं छोड़ती है। वे ही व्यक्ति भरते हैं जो धन का संचय किया करते हैं और जो लोग इस धन को खा पी कर साफ कर देते हैं वे इस भव-सागर से पार उतर जाते हैं।

  13. Kabir 16.13
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    कबीर सो धन संचिए, जो आगैं कू होइ। सीस चढ़ाये पोटली, ले जात न देख्या कोई॥

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    ―कबीर दास जी कहते हैं कि सुकृत्यो और पुण्यो का ऐसा धन संग्रह करना चाहिए आने के लिए परलोक में काम दे। यद्यपि इस संसार मे लोग धन की गठरी लादे हुए फिरते रहते हैं किन्तु कोई भी व्यक्ति नहीं देखा गया जो उस धन को परलोक ले गया हो। वह सारा का सारा धन यहीं पर पड़ा रह जाता है। ​

  14. Kabir 16.14
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    त्रिया त्रिषणाँ पापणीं, तासू प्रीति न जोड़ि। पैंड़ी चढ़ पाछाँ पड़ै, लागै मोटी खोड़ि॥

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    ―कबीर दास जी जीव को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि तृष्णा रूपी स्त्री बडी ही पापिनी और वेश्या के समान है अतः तू इससे प्रेम का व्यवहार न कर। पहले तो यह पीछे पडकर जीव को आकर्षित करती है किन्तु इसके संसर्ग से जीव को अनेक दोषो का शिकार बनना पडता है। शव्दार्थ―खोडि=अपराध, पाप

  15. Kabir 16.15
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    त्रिष्णां सांचीं नां बुझै, दिन-दिन बढ़ती जाय। जवासा के रूप ज्यूं, घण मेहाॅ कुमिलाइ॥

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    ―सासारिक तृष्णा को जितना ही अधिक शान्त करने का प्रयास किया जाता है वह दिन प्रति दिन उतना ही अधिक बदली जाती है। जिस प्रकार जवासा जितनी ही अधिक वर्षा होती है उतना ही अधिक मुरझाता जाता है उसी प्रकार यह सासारिक तृष्णा भी प्रभु-भक्ति रूपी से हो मुरझा कर शान्त हो सकती है अन्य किसी विधि से नही। विशेष―(१) विभावना अलकार। (२) जवासा वरसात मे मुरझा जाता है― “अर्क जवास पात बिनु मयऊ।” मानस―किष्किन्धा काण्ड

  16. Kabir 16.16
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    कबीर जग की को कहै, यौ जल बूढै दास। पारब्रह्म पति छाँड़ि करि, करैं मान की आस॥

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    कबीर दास जी कहते हैं कि ससार के साधारण व्यक्तियों की बात कौन कहे भगवान के भक्त भी इस संसार-सागर मे डूबते उतराते हैं किन्तु भक्त उसी अवस्था मे डूबते हैं जब पर ब्रह्म ऐसे स्वामी को छोड़कर सांसारिक मान सम्मान की आशा मे इधर उधर भटकते रहते हैं।

  17. Kabir 16.17
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    माया तजी तौ का भया, मानि तजी नहीं जाइ। मनि बड़ै मुनियर मिले, मानि सबनि कौ खाइ॥

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    ―हे जीव! यदि तूने माया का त्याग कर दिया तो उसी के त्याग से क्या होता है अभी सम्मान पाने की भावना का त्याग तो नहीं है। यह मान सम्मान को भावना बडे-बडे मुनियों को भी पथ भ्रष्ट कर देती है। अतः सम्मान की भी परित्याग आवश्यक है।

  18. Kabir 16.18
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    ​ सौंदर्भ―माया के साथ अहं का त्याग भी आवश्यक है। रामहि थोड़ा जाँणि करि, दुनियाँ आगैं दीन। जीवॉ कौ राजा कहैं, माया के आधीन॥

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    ―मनुष्य ब्रह्म के अस्तित्व को अल्प समझ करके संसार को ही अधिक महत्वशाली समझता रहता है और उसी मे उलझता रहता है। मनुष्य उस व्यक्ति को ही अपना स्वामी समझ लेते हैं जो माया के साधीन होकर वैभवशाली दिखाई पड़ता है। रज बीरज की कली, तापरि साज्या रूप

  19. Kabir 16.19
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    राँम नाँम बिन बूढ़ि है, कनक काँमिणी कूप॥

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    ―मनुष्य का शरीर स्त्री के रज और पुरुष के वीर्यं के सम्मिश्रण से बनी हुई कली के समान उस पर भी जीव साज सज्जा का आडम्बर करता है किन्तु यदि वह राम नाम का आश्रय न ग्रहण करेगा तो धन और स्त्री रूपी कुएं मे डूब जायगा। विशेष―तुलसी ने भी कहा है― “एक कंचन एक कामिनी दुर्गम घाटी दोइ॥” दोहावली

  20. Kabir 16.20
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    माया तरवर त्रिविधका, साखा दुख सन्ताप। सीतलता सुपिनैं नहीं, फल फीकौ तनि ताप॥

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    ―माया रूपी वृक्ष सात्विक, राजस और तामस इन तीन गुणो से मिलकर बना है और इसकी शाखायें दुख और सन्ताप की हैं किन्तु इस वृक्ष के नीचे बैठकर जीव को स्वप्न मे भी शीतलता का अनुभव नहीं हो सकता है और इसके फल भी अत्यन्त फीके हैं और शरीर को ताप देने वाले हैं।

  21. Kabir 16.21
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    कबीर माया डाकणीं, सब किस ही कौं खाइ। दाँत उपाड़ौं पापणीं, जे सन्तौं नेड़ी जाइ॥

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    ―कबीर दास जी कहते हैं कि यह माया अत्यन्त पिशाचिनी है यह सभी को खाती रहती हैं किन्तु यदि यह सन्तो――साधु स्वभाव वाले व्यक्तियो―के पास जाकर फटकी तो मैं इसके दाँत ही उखाड डालूंगा फिर यह खायेगी कैसे?

  22. Kabir 16.22
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    नलनी सायर घर किया, दौं लागी बहुतेणि। जलही माहें जलि मुई, पूरब जनम लिषेणि॥

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    ―आत्मा रूपी कमलिनी ने इस संसार सागर मे अपना घर बनाया किन्तु यही अनेकानेक दुखो की दावाग्नि उस कमलिनी को जलाने लगी। और इस प्रकार यह आत्मा रूपी कमलिनी माया रूपी जल मे ही जलकर नष्ट हो गयी। यह सब पूर्व-जन्म के कर्मों का फल था।

  23. Kabir 16.23
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    कबीर गुण की बादली, तीतर बानी छाँहि। बाहरि रहे ते ऊबरे, भीगे मन्दिर मांहि॥

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    ―कबीर दास जी कहते हैं सात्विक, राजस और तामस इन तीनो के सम्मिश्ररण से बनी हुई माया की छाया रग तीतर के पखो के समान बहुरगी होता है। जो इस माया की छाया से बाहर रहते हैं वे तो मुक्त हो जाते हैं और जो माया के प्रभाव से हो आ जाते हैं तो वे माया के प्रभाव से भीगते ही रहते हैं। विशेष―(१) विरोधाभास अलकार।

  24. Kabir 16.24
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    कबीर माया मोह को, भई ॲधारी लोइ। जे सूते ते मुसि लिये, रहे बसत कूॅ रोइ॥

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    ―कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार मे जीव की आँखो पर माया और मोह का अन्धकार छाया हुआ है अतः उसे उचित मार्ग नही दिखाई पडता है। जो व्यक्ति इस माया और मोह के अन्धकार मे सावधान न रहकर अज्ञान मे सोते ही रहते हैं वे ठग लिए जाते हैं और बाद मे मुक्ति रूपी अपनो वस्तु के लिए रोते ही रह जाते हैं। शव्दार्थ―लोइ=नेत्र। मुसि=ठगलिए। वसत=वस्तु, सारतत्व।

  25. Kabir 16.25
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    संकल ही तै सब लहै, माया इहि संसार। ते क्यूँ छूटैं बापुड़े, बाँधे सिरजनहार॥

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    ―इस संसार के समस्त प्राणी माया की श्रृंखलाओ मे जकड़े हुए हैं किन्तु जब उनके सृजनकर्ता ब्रह्म ने ही उनको माया मे बाँध दिया है तो फिर वे मुक्त ही कैसे हो सकते हैं? शव्दार्थ―संकल=साक्त, श्रृंखला। बापुडे=बपुरे=बेचारे।

  26. Kabir 16.26
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    बाड़ि चंढ़ति बेलि ज्यूँ, उलझी आसा कंध। तूटै पणि छूटै नहीं, भई ज बाचा बंध॥

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    ―यह माया संसार रूपी बाडी पर बेलि के समान है और आशा के फंदो मे इसे उलझा दिया गया है। अर्थात् यह माया जीव को आशा और तृष्णा के फंदो मे उलझा देती है। यह टूट सकती है किन्तु किसी प्रकार से छुडाई नही जा सकती है। मानो हानि या लाभ कुछ भी होने पर यह जीवात्मा को पकडे रहने की प्रतिज्ञा कर चुकी है। शव्दार्थ―फंध=फंदा। वाचावन्ध=वचन वद्ध।

  27. Kabir 16.27
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    सब आसण आसा तणाँ, निवर्ति कै को नाहिं। निर्वत्ति के निबहै नहीं, परवति पर पंचमांहि॥

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    ―संसार के समस्त प्राणी आशावान् है सभी पर आशा की प्रभाव है। कोई निवृत्ति मार्गी नहीं है। जो प्रवृत्ति मार्ग का अनुरागी है भला वह आशा से परे होकर निवृत्ति मार्गी कैसे हो सकता है? ​

  28. Kabir 16.28
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    कबीर इस संसार का, झूठा माया मोह। जिहि घरि जिता बंधावणा, तिहिं घरि तिता ॲदोह॥

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    कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार का माया मोह सभी झूठा प्रपंच है। जिस घर में जितनी ही अधिक प्रसन्नता आनन्द-मंगल दिखाई देता है, वहाँ उतना ही अधिक दुख भी होता है। शाव्दार्थ―बंधावणा=बधन। अन्दोह=दुख।

  29. Kabir 16.29
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    माया हम सौं यौ कह्या, तू मति दे रे पूठि। और हमारा हम बलू, गया कबीरा रूठि॥

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    ―माया ने हमसे (जीवात्मा से) यो कहा कि तुझ को मत छोड। किन्तु यह हमारा ही आत्मबल है कि मैं (कबीरदास) माया से अप्रसन्न हो गया और उस माया से रूठ गया, अप्रसन्न हो गया।

  30. Kabir 16.30
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    बुगली नीर बिटालिया, सायर चढ़या कलंक। और पखेरू पी गये, हॅस न बोवैं चंच॥

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    ―माया रूपी बगुली ने आत्मा के जल को दूषित कर दिया, इससे संसार रूपी सागर भी कलकित हो गया अन्यपक्षी, सासारिक मनुष्य तो इस विषय वासना के पानी को पी गए किन्तु मुक्तात्माओ (हसो) ने इस जल को छुआ तक नही है।

  31. Kabir 16.31
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    कबीर माया जिनि मिलै, सौ बरिया दे बाॅह। नारद से मुनियर गिले, किसी भरीसौ त्यांह॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―कबीरदास जी कहते हैं कि अगर माया सैकडो प्रलोभन देकर के तुझे फंसाना चाहे तो भी उसके फन्दे मे नही पडना चाहिए। जब इस माया ने ​नारद ऐसे प्रभु भक्तों तक को अपने जाल मे फॉस लिया है तो फिर इसका भरोसा कैसे किया जा सकता है?

  32. Kabir 16.32
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    संदर्भ―माया का कोई भरोसा नही है उसके फन्दे मे नही पडना चाहिए। माया की झल जग जल्या, कनक कॉमिणीं लागि। कहू, धौं, किहि विधि राखिए, रूई पलेटी आगि॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―कनक और कामिनी-धन और स्त्री के लोभ में फंसकर सारा संसार मसा के जल मे फंस गया और उसी की लपट मे जलने लगा भस्म हो गया। माया तो रूई मे लपेटी हुई आग समान है जिस प्रकार रूई मे लपेटी हुई आग थोडे समय मे ही रूई को जलाने लगती है उसी प्रकार माया भी संसार को जलाने लगती है। विशेष―निदर्शना अलंकार। शव्दार्थ―झल=अग्नि। पलेटो=लपेटी हुई।