Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Chapter 27
Kavita Kosh दोहावली — पृष्ठ १०
कबीर दोहावली / पृष्ठ १०
6 verses
हस्ती चढ़िये ज्ञान की, सहज दुलीचा डार । श्वान रूप संसार है, भूकन दे झक मार ॥
या दुनिया दो रोज की, मत कर या सो हेत । गुरु चरनन चित लाइये, जो पूरन सुख हेत ॥
कबीर यह तन जात है, सको तो राखु बहोर । खाली हाथों वह गये, जिनके लाख करोर ॥
सरगुन की सेवा करो, निरगुन का करो ज्ञान । निरगुन सरगुन के परे, तहीं हमारा ध्यान ॥
घन गरजै, दामिनि दमकै, बूँदैं बरसैं, झर लाग गए। हर तलाब में कमल खिले, तहाँ भानु परगट भये॥
क्या काशी क्या ऊसर मगहर, राम हृदय बस मोरा। जो कासी तन तजै कबीरा, रामे कौन निहोरा ॥