Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Chapter 11
निहकर्मी पतिव्रता कौ अंग
निहकर्मी पतिव्रता कौ अंग
16 verses
कबीर प्रीतड़ी तौ तुझसौं, बहु गुण याले कन्त। जे हॅसि बोलौ और सौं, तौ नील रॅगाऊॅ दन्त॥
अर्थ (Hindi) — hi.wikisource
―हे अनन्त गुणो वाले प्रियतम(ब्रह्मा)। कबीर का एकमात्र तुझ से ही प्रेम है। यदि मैं तुझे छोडकर अन्य किसी से हँस बोलकर प्रेम करुँ तो वह मुँह पर स्याही लगाकर मुँह को कलकित करने के समान है।
सन्दर्भ―साधक केवल परमात्मा से प्रेम करता है। नैनां अन्तर आवतूॅ, ज्यूॅहौ नैन भैपेउ। नाँ हौं देखौं और कूॅ, नांतुझ देखन देउॅ॥
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―हे प्रियतम! तुम नेत्रो के अन्दर आजाओ और मैं तुरन्त नेत्रो को मूँदलूँ। जिससे न तो मैं ही तुम्हारे अतिरिक्त किसी अन्य को देख सकूं और न तुम को ही अपने अतिरिक्त किसी अन्य को देखने दूँ। तुम् मुजे देखो और मैं तुमे देखूँ। सब्दार्थ―अंतरि=अन्दर। झंपेड=मूँदलूँगा।
मेरा तुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा। तेरा तुझको सौंपता, क्या लागै मेरा॥
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―कबीरदास जी कहते हैं कि समुद्र मे पड़ी हुई सीपी उसके जल से तृप्त न होकर प्यास रठती रहती है। वह तो स्वाति नक्षत्र के बूँद को आशाएँ विशाल समुद्र को तिनके के समान नगण्य समझती है। विशेष―अन्योक्ति अलंकार।
कबीर सुख कौं जाइ था,आगे आया दुख। जाइ सुख घरि आपणै,हम जाणै अरु दुख॥
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―कबीरदास जी कहते है कि इस विषय विकार से भरे हुए संसार के सुखो मे लिप्त होने जा ही रहा था कि अचानक मेरा साक्षात्कार परमात्मा के विरहरुपी दुख से हो गया। तब मैंने सांसारिक दुखों को तिमाजलि देकर ईश्वर की प्राप्ति के लिए विरह(दुख) को ही सहने का लक्ष्य बनाया है।
दो जग तौ हम ॲगिया,यहु डर नाहीं मुझ। भिस्त न मेरे चाहिए, बांँझ पियारे तुझ॥
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―कबीरदास जी कहते हैं कि यदि मुझे नरक मे भी जाना पढे और वहाँ पर मुझे परमात्मा के दर्शन न होता रहे तो मुझे कोई भय नही है। किन्तु ऐप्रितम! तेरे बिना यदि मुझे स्वर्ग मे भी जाना पडे, तो वह भी मेरे लिए त्याज्य है,व्यर्थ है। शब्दार्थ―दो जग=दो जख-वर्क। मिस्न=बहिश्त-स्वर्गं। वाँझ=रहित है।
संदर्भ―ईश्वर के अभाव मे भक्त स्वगं भी नही चाहता है। जे ओ एकै न जाँणियाँ, तो जाँण्याँ सव जाँण। जे ओ एक न जाँणियाँ, वो सब ही जाँण अजाँण॥
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―जिसने एक परमात्मा को जान लिया उसने संसार के सम्पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लिया। और जिसने उस एक परमात्मा को नहीं जाना उसका संसार की अन्य वस्तुओं का ज्ञान अज्ञान के ही समान है।
कबीर एक न जाँणियाँ, तौ बहुजाँण्याँ क्या होइ। एकै तैं सव होत है, सवतैं एक न होइ॥
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―कबीरदास जी कहते हैं जिसने एक परमात्मा को नहीं जाना उसका और सव ज्ञान क्या होगा। वह व्यर्थ है। उस एक परमात्मा के ज्ञान से तो और सभी ज्ञान प्राप्त हो जाते हैं कि और सब ज्ञानो से उस परमात्मा का ज्ञान नहीं होता है।
जब लगि भगति सकांमता, तब लगि निर्फल सेव। कहै कबीर वै क्यूॅ मिलै, निहकांमी निज देव॥
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―जब तक भक्ति मे कामना मिली होती है किसी स्वार्थ के लिए ईश्वर का स्मरण किया जाता है तब तक ईश्वर की सम्पूर्ण सेवा व्यर्थ होती है। कबीरदास जी कहते हैं कि जो ईश्वर निष्काम है उसे तो निष्काम भक्ति से हो प्राप्त किया जा सकता है साम भक्ति से यह कैसे मिल सकता है?
आसा एक जु राम की, दूजी आस निराम। पाँणी माँहै घर करैं, ते भी मरैं पियास॥
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―जिसको एक परमात्मा की आशा है उसके लिए अन्य आशाएँ व्यर्थ हैं निराशामात्र है क्योकि उसी एक से सबकी प्राप्ति होती है। सांसारिक कामनाओ का अन्त तो निराशाएँ होता है। जो व्यक्ति ईश्वर की आशा को छोड़ कर अन्य की आशा करते हैं वह तो उन लोगो के समान है। जो पानी में रहकर भी प्यासे मरते हैं।
जें मन लागै एक सूँ, तौ निरबाल्या जाइ। तूरा दुइ मुखि बाजरणँ, न्याइ तमाचे खाइ॥
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―यदि जीव का मन परमात्मा पर ही आसक्त हो जाय तो उसका निर्वाह हो जायगा और यदिवह ईश्वर के अतिरिक्त अन्य का ध्यान करता है तो उसे सांसारिक दुख उसी प्रकार सहन करने पड़ेगे जिस प्रकार तुरही को दोमुखों से बजने के कारण अकारण ही हाथ के प्रहार सहन करने पड़ते हैं। शव्दार्थ―निरवाल्या=निर्वाह हो जाएगा। तूरा=तुरही। न्याइ=उचित।बाजणाँ=बजाने से।
कबीर कलिजुग आइकर, कीये बहुतज मीत। जिन दिल बॅधी एक सूँ, ते सुखु सोवै नचींत॥
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―कबीरदास जी कहते हैं कि इस कलियुग मे आकर मनुष्य अनेको मित्रो को बनाता है किन्तु वे सभी दुख देने वाले होते हैं परन्तु यदि एक परमात्मा को मित्र बना लिया जाय तो जीव जीवन पर्यंत निश्चिन्त होकर सो सकता है।
कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाँउॅ। गलै राम की जेवड़ी, जित खैंचे वित जाँउॅ॥
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―कबीरदास जी कहते हैं कि मैं राम का कुत्ता हूँ और मेरा नाम मुतिया (मुक्त) है मेरे गले में राम नाम की रस्सी पड़ी हुई है उस रस्सी को पड़ कर मेरे स्वामी राम जिधर मुझे घुमाते हैं मैं उधर हो घूम जाता हूँ। विशेष―रूपक अलंकार।
तो तो करै त बाहुड़ों, दुरि दुरि करै तो जाउॅ। ज्यूॅ हरि राखै त्यूॅ रहौं, जो देवै सो खाउँ॥
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―यदि ईश्वर मुझ कुते को तू-तू करके बुलाते हैं तो मैं तुरन्त हो उनके समीप पहुँच जाता हूँ और यदि दुरदुरा देते हैं तो मैं दूर चला जाता हूँ। इस प्रकार में राम की इच्छा पर ही रहता हूँ। वह जो कुछ खाने को दे देते हैं वही खा लेता हूँ,
मन प्रतीत का प्रेम रस, नाँ इस तन मैं ढंग। क्या जाणौ उस पीव सू, कैसे रहसी रंग॥
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―कबीर दास जी कहते हैं कि मेरा मन न तो ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास रखता है और न प्रेम रस से हो परिपूर्ण है और शरीर भी उसके मिलन के लिए उपयुक्त नहीं है फिर समझ में नहीं आता कि राम्र-रंग के खेलो मे उत्त ईश्वर के साथ कैने प्रवृति होगो।
संदर्भ―जीवात्मा को चिन्ता है कि वह प्रभु-मिलन के आचार-व्यवहार तक से भी परिचत नहीं है फिर मिलन कैसे होगी। उस संम्रथ का दाश हौं, कदे न होइ अकाज। पतिव्रता नॉगी रहे, तो उस ही पुरिम कौ लाज॥
अर्थ (Hindi) — hi.wikisource
मैं उस समय पुरुष परमात्मा का सेवक हैं जो सर्वपक्तिमान है। इस कारण मेरा किसी भी प्रकार अनर्थ नहीं हो सकता है जिस प्रकार पतिव्रता स्त्री के नयन रहने पर उसके पति को ही लज्जा आती है उसी प्रकार मेरे होने में भी परमात्मा के लिए ही लज्जा का विषय है। प० मा० फा०――१० शब्दार्थ—सम्रय=सामथ्यँवान ब्रह्म। कदे=कभी भी।
संदर्भ―भक्ति पर यदि आपत्ति आयेगी तो ईश्वर के लिए लज्जा का विषय है। धरि परमेसुर पाहुणां, सुणौं सनेही दास। षटरस भोजन भगति करि ज्यूॅ कदेन छाँड़ै पास॥
अर्थ (Hindi) — hi.wikisource
―कबीर दास जो कहते हैं कि है प्रेमो भक्तो। ध्यान पूर्वक सुनो इस हृदय रूपी घर मे प्रभुरूपी अतिथि पधारे हैं। उसकी सेवा मे भक्ति रूपी षट् रस व्यंजन प्रस्तुत करो ता कि वे प्रसन्न हो कर कभी भी तुम्हारा साथ न छोड़े। सदैव तुम्हारे साथ रहे। विशेष―रूपक अलंकार।