मैं उस समय पुरुष परमात्मा का सेवक हैं जो सर्वपक्तिमान है। इस कारण मेरा किसी भी प्रकार अनर्थ नहीं हो सकता है जिस प्रकार पतिव्रता स्त्री के नयन रहने पर उसके पति को ही लज्जा आती है उसी प्रकार मेरे होने में भी परमात्मा के लिए ही लज्जा का विषय है। प० मा० फा०――१० शब्दार्थ—सम्रय=सामथ्यँवान ब्रह्म। कदे=कभी भी।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ―जीवात्मा को चिन्ता है कि वह प्रभु-मिलन के आचार-व्यवहार तक से भी परिचत नहीं है फिर मिलन कैसे होगी। उस संम्रथ का दाश हौं, कदे न होइ अकाज। पतिव्रता नॉगी रहे, तो उस ही पुरिम कौ लाज॥
Kabir 11.15