Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Chapter 25
Kavita Kosh दोहावली — पृष्ठ ८
कबीर दोहावली / पृष्ठ ८
100 verses
सेवक सेवा में रहै, सेवक कहिये सोय । कहैं कबीर सेवा बिना, सेवक कभी न होय ॥
अनराते सुख सोवना, राते नींद न आय । यों जल छूटी माछरी, तलफत रैन बिहाय ॥
यह मन ताको दीजिये, साँचा सेवक होय । सिर ऊपर आरा सहै, तऊ न दूजा होय ॥
गुरु आज्ञा मानै नहीं, चलै अटपटी चाल । लोक वेद दोनों गये, आये सिर पर काल ॥
आशा करै बैकुण्ठ की, दुरमति तीनों काल । शुक्र कही बलि ना करीं, ताते गयो पताल ॥
द्वार थनी के पड़ि रहे, धका धनी का खाय । कबहुक धनी निवाजि है, जो दर छाड़ि न जाय ॥
उलटे सुलटे बचन के शीष न मानै दुख । कहैं कबीर संसार में, सो कहिये गुरुमुख ॥
कहैं कबीर गुरु प्रेम बस, क्या नियरै क्या दूर । जाका चित जासों बसै सौ तेहि सदा हजूर ॥
गुरु आज्ञा लै आवही, गुरु आज्ञा लै जाय । कहैं कबीर सो सन्त प्रिय, बहु विधि अमृत पाय ॥
गुरुमुख गुरु चितवत रहे, जैसे मणिहि भुजंग । कहैं कबीर बिसरे नहीं, यह गुरु मुख के अंग ॥
यह सब तच्छन चितधरे, अप लच्छन सब त्याग । सावधान सम ध्यान है, गुरु चरनन में लाग ॥
ज्ञानी अभिमानी नहीं, सब काहू सो हेत । सत्यवार परमारथी, आदर भाव सहेत ॥
दया और धरम का ध्वजा, धीरजवान प्रमान । सन्तोषी सुख दायका, सेवक परम सुजान ॥
शीतवन्त सुन ज्ञान मत, अति उदार चित होय । लज्जावान अति निछलता, कोमल हिरदा सोय ॥
कबीर गुरु कै भावते, दूरहि ते दीसन्त । तन छीना मन अनमना, जग से रूठि फिरन्त ॥
कबीर गुरु सबको चहै, गुरु को चहै न कोय । जब लग आश शरीर की, तब लग दास न होय ॥
सुख दुख सिर ऊपर सहै, कबहु न छोड़े संग । रंग न लागै का, व्यापै सतगुरु रंग ॥
गुरु समरथ सिर पर खड़े, कहा कभी तोहि दास । रिद्धि-सिद्धि सेवा करै, मुक्ति न छोड़े पास ॥
लगा रहै सत ज्ञान सो, सबही बन्धन तोड़ । कहैं कबीर वा दास सो, काल रहै हथजोड़ ॥
काहू को न संतापिये, जो सिर हन्ता होय । फिर फिर वाकूं बन्दिये, दास लच्छन है सोय ॥
दास कहावन कठिन है, मैं दासन का दास । अब तो ऐसा होय रहूँ पाँव तले की घास ॥
दासातन हिरदै बसै, साधुन सो अधीन । कहैं कबीर सो दास है, प्रेम भक्ति लवलीन ॥
दासातन हिरदै नहीं, नाम धरावै दास । पानी के पीये बिना, कैसे मिटै पियास ॥
भक्ति कठिन अति दुर्लभ, भेष सुगम नित सोय । भक्ति जु न्यारी भेष से, यह जनै सब कोय ॥
भक्ति बीज पलटै नहीं जो जुग जाय अनन्त । ऊँच-नीच धर अवतरै, होय सन्त का अन्त ॥
भक्ति भाव भादौं नदी, सबै चली घहराय । सरिता सोई सराहिये, जेठ मास ठहराय ॥
भक्ति जु सीढ़ी मुक्ति की, चढ़े भक्त हरषाय । और न कोई चढ़ि सकै, निज मन समझो आय ॥
भक्ति दुहेली गुरुन की, नहिं कायर का काम । सीस उतारे हाथ सों, ताहि मिलै निज धाम ॥
भक्ति पदारथ तब मिलै, जब गुरु होय सहाय । प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरण भाग मिलाय ॥
भक्ति भेष बहु अन्तरा, जैसे धरनि अकाश । भक्त लीन गुरु चरण में, भेष जगत की आश ॥
कबीर गुरु की भक्ति करूँ, तज निषय रस चौंज । बार-बार नहिं पाइये, मानुष जन्म की मौज ॥
भक्ति दुवारा साँकरा, राई दशवें भाय । मन को मैगल होय रहा, कैसे आवै जाय ॥
भक्ति बिना नहिं निस्तरे, लाख करे जो कोय । शब्द सनेही होय रहे, घर को पहुँचे सोय ॥
भक्ति नसेनी मुक्ति की, संत चढ़े सब धाय । जिन-जिन आलस किया, जनम जनम पछिताय ॥
गुरु भक्ति अति कठिन है, ज्यों खाड़े की धार । बिना साँच पहुँचे नहीं, महा कठिन व्यवहार ॥
भाव बिना नहिं भक्ति जग, भक्ति बिना नहीं भाव । भक्ति भाव इक रूप है, दोऊ एक सुभाव ॥
कबीर गुरु की भक्ति का, मन में बहुत हुलास । मन मनसा माजै नहीं, होन चहत है दास ॥
कबीर गुरु की भक्ति बिन, धिक जीवन संसार । धुवाँ का सा धौरहरा, बिनसत लगै न बार ॥
जाति बरन कुल खोय के, भक्ति करै चितलाय । कहैं कबीर सतगुरु मिलै, आवागमन नशाय ॥
देखा देखी भक्ति का, कबहुँ न चढ़ सी रंग । बिपति पड़े यों छाड़सी, केचुलि तजत भुजंग ॥
आरत है गुरु भक्ति करूँ, सब कारज सिध होय । करम जाल भौजाल में, भक्त फँसे नहिं कोय ॥
जब लग भक्ति सकाम है, तब लग निष्फल सेव । कहैं कबीर वह क्यों मिलै, निहकामी निजदेव ॥
पेटे में भक्ति करै, ताका नाम सपूत । मायाधारी मसखरैं, लेते गये अऊत ॥
निर्पक्षा की भक्ति है, निर्मोही को ज्ञान । निरद्वंद्वी की भक्ति है, निर्लोभी निर्बान ॥
तिमिर गया रवि देखते, मुमति गयी गुरु ज्ञान । सुमति गयी अति लोभ ते, भक्ति गयी अभिमान ॥
खेत बिगारेउ खरतुआ, सभा बिगारी कूर । भक्ति बिगारी लालची, ज्यों केसर में घूर ॥
ज्ञान सपूरण न भिदा, हिरदा नाहिं जुड़ाय । देखा देखी भक्ति का, रंग नहीं ठहराय ॥
भक्ति पन्थ बहुत कठिन है, रती न चालै खोट । निराधार का खोल है, अधर धार की चोट ॥
भक्तन की यह रीति है, बंधे करे जो भाव । परमारथ के कारने यह तन रहो कि जाव ॥
भक्ति महल बहु ऊँच है, दूरहि ते दरशाय । जो कोई जन भक्ति करे, शोभा बरनि न जाय ॥
और कर्म सब कर्म है, भक्ति कर्म निहकर्म । कहैं कबीर पुकारि के, भक्ति करो तजि भर्म ॥
विषय त्याग बैराग है, समता कहिये ज्ञान । सुखदाई सब जीव सों, यही भक्ति परमान ॥
भक्ति निसेनी मुक्ति की, संत चढ़े सब आय । नीचे बाधिनि लुकि रही, कुचल पड़े कू खाय ॥
भक्ति भक्ति सब कोइ कहै, भक्ति न जाने मेव । पूरण भक्ति जब मिलै, कृपा करे गुरुदेव ॥
कबीर गर्ब न कीजिये, चाम लपेटी हाड़ । हयबर ऊपर छत्रवट, तो भी देवैं गाड़ ॥
कबीर गर्ब न कीजिये, ऊँचा देखि अवास । काल परौं भुंइ लेटना, ऊपर जमसी घास ॥
कबीर गर्ब न कीजिये, इस जीवन की आस । टेसू फूला दिवस दस, खंखर भया पलास ॥
कबीर गर्ब न कीजिये, काल गहे कर केस । ना जानो कित मारि हैं, कसा घर क्या परदेस ॥
कबीर मन्दिर लाख का, जाड़िया हीरा लाल । दिवस चारि का पेखना, विनशि जायगा काल ॥
कबीर धूल सकेलि के, पुड़ी जो बाँधी येह । दिवस चार का पेखना, अन्त खेह की खेह ॥
कबीर थोड़ा जीवना, माढ़ै बहुत मढ़ान । सबही ऊभ पन्थ सिर, राव रंक सुल्तान ॥
कबीर नौबत आपनी, दिन दस लेहु बजाय । यह पुर पटृन यह गली, बहुरि न देखहु आय ॥
कबीर गर्ब न कीजिये, जाम लपेटी हाड़ । इस दिन तेरा छत्र सिर, देगा काल उखाड़ ॥
कबीर यह तन जात है, सकै तो ठोर लगाव । कै सेवा करूँ साधु की, कै गुरु के गुन गाव ॥
कबीर जो दिन आज है, सो दिन नहीं काल । चेति सकै तो चेत ले, मीच परी है ख्याल ॥
कबीर खेत किसान का, मिरगन खाया झारि । खेत बिचारा क्या करे, धनी करे नहिं बारि ॥
कबीर यह संसार है, जैसा सेमल फूल । दिन दस के व्यवहार में, झूठे रंग न भूल ॥
कबीर सपनें रैन के, ऊधरी आये नैन । जीव परा बहू लूट में, जागूँ लेन न देन ॥
कबीर जन्त्र न बाजई, टूटि गये सब तार । जन्त्र बिचारा क्याय करे, गया बजावन हार ॥
कबीर रसरी पाँव में, कहँ सोवै सुख-चैन । साँस नगारा कुँच का, बाजत है दिन-रैन ॥
कबीर नाव तो झाँझरी, भरी बिराने भाए । केवट सो परचै नहीं, क्यों कर उतरे पाए ॥
कबीर पाँच पखेरूआ, राखा पोष लगाय । एक जु आया पारधी, लइ गया सबै उड़ाय ॥
कबीर बेड़ा जरजरा, कूड़ा खेनहार । हरूये-हरूये तरि गये, बूड़े जिन सिर भार ॥
एक दिन ऐसा होयगा, सबसों परै बिछोह । राजा राना राव एक, सावधान क्यों नहिं होय ॥
ढोल दमामा दुरबरी, सहनाई संग भेरि । औसर चले बजाय के, है कोई रखै फेरि ॥
मरेंगे मरि जायँगे, कोई न लेगा नाम । ऊजड़ जाय बसायेंगे, छेड़ि बसन्ता गाम ॥
कबीर पानी हौज की, देखत गया बिलाय । ऐसे ही जीव जायगा, काल जु पहुँचा आय ॥
कबीर गाफिल क्या करे, आया काल नजदीक । कान पकरि के ले चला, ज्यों अजियाहि खटीक ॥
कै खाना कै सोवना, और न कोई चीत । सतगुरु शब्द बिसारिया, आदि अन्त का मीत ॥
हाड़ जरै जस लाकड़ी, केस जरै ज्यों घास । सब जग जरता देखि करि, भये कबीर उदास ॥
आज काल के बीच में, जंगल होगा वास । ऊपर ऊपर हल फिरै, ढोर चरेंगे घास ॥
ऊजड़ खेड़े टेकरी, धड़ि धड़ि गये कुम्हार । रावन जैसा चलि गया, लंका का सरदार ॥
पाव पलक की सुधि नहीं, करै काल का साज । काल अचानक मारसी, ज्यों तीतर को बाज ॥
आछे दिन पाछे गये, गुरु सों किया न हैत । अब पछितावा क्या करे, चिड़िया चुग गई खेत ॥
आज कहै मैं कल भजूँ, काल फिर काल । आज काल के करत ही, औसर जासी चाल ॥
कहा चुनावै मेड़िया, चूना माटी लाय । मीच सुनेगी पापिनी, दौरि के लेगी आय ॥
सातों शब्द जु बाजते, घर-घर होते राग । ते मन्दिर खाले पड़े, बैठने लागे काग ॥
ऊँचा महल चुनाइया, सुबरदन कली ढुलाय । वे मन्दिर खाले पड़े, रहै मसाना जाय ॥
ऊँचा मन्दिर मेड़िया, चला कली ढुलाय । एकहिं गुरु के नाम बिन, जदि तदि परलय जाय ॥
ऊँचा दीसे धौहरा, भागे चीती पोल । एक गुरु के नाम बिन, जम मरेंगे रोज ॥
पाव पलक तो दूर है, मो पै कहा न जाय । ना जानो क्या होयगा, पाव के चौथे भाय ॥
मौत बिसारी बाहिरा, अचरज कीया कौन । मन माटी में मिल गया, ज्यों आटा में लौन ॥
घर रखवाला बाहिरा, चिड़िया खाई खेत । आधा परवा ऊबरे, चेति सके तो चेत ॥
हाड़ जले लकड़ी जले, जले जलवान हार । अजहुँ झोला बहुत है, घर आवै तब जान ॥
पकी हुई खेती देखि के, गरब किया किसान । अजहुँ झोला बहुत है, घर आवै तब जान ॥
पाँच तत्व का पूतरा, मानुष धरिया नाम । दिना चार के कारने, फिर-फिर रोके ठाम ॥
कहा चुनावै मेड़िया, लम्बी भीत उसारि । घर तो साढ़े तीन हाथ, घना तो पौने चारि ॥
यह तन काँचा कुंभ है, लिया फिरै थे साथ । टपका लागा फुटि गया, कछु न आया हाथ ॥
कहा किया हम आपके, कहा करेंगे जाय । इत के भये न ऊत के, चाले मूल गँवाय ॥
जनमै मरन विचार के, कूरे काम निवारि । जिन पंथा तोहि चालना, सोई पंथ सँवारि ॥ अगला भाग >>