Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Chapter 23
Kavita Kosh दोहावली — पृष्ठ ६
कबीर दोहावली / पृष्ठ ६
99 verses
जाका गुरु है गीरही, गिरही चेला होय । कीच-कीच के धोवते, दाग न छूटे कोय ॥
गुरु मिला तब जानिये, मिटै मोह तन ताप । हरष शोष व्यापे नहीं, तब गुरु आपे आप ॥
यह तन विषय की बेलरी, गुरु अमृत की खान । सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान ॥
बँधे को बँधा मिला, छूटै कौन उपाय । कर सेवा निरबन्ध की पल में लेय छुड़ाय ॥
गुरु बिचारा क्या करै, शब्द न लागै अंग । कहैं कबीर मैक्ली गजी, कैसे लागू रंग ॥
गुरु बिचारा क्या करे, ह्रदय भया कठोर । नौ नेजा पानी चढ़ा पथर न भीजी कोर ॥
कहता हूँ कहि जात हूँ, देता हूँ हेला । गुरु की करनी गुरु जाने चेला की चेला ॥
शिष्य पुजै आपना, गुरु पूजै सब साध । कहैं कबीर गुरु शीष को, मत है अगम अगाध ॥
हिरदे ज्ञान न उपजै, मन परतीत न होय । ताके सद्गुरु कहा करें, घनघसि कुल्हरन होय ॥
ऐसा कोई न मिला, जासू कहूँ निसंक । जासो हिरदा की कहूँ, सो फिर मारे डंक ॥
शिष किरपिन गुरु स्वारथी, किले योग यह आय । कीच-कीच के दाग को, कैसे सके छुड़ाय ॥
स्वामी सेवक होय के, मनही में मिलि जाय । चतुराई रीझै नहीं, रहिये मन के माय ॥
गुरु कीजिए जानि के, पानी पीजै छानि । बिना विचारे गुरु करे, परे चौरासी खानि ॥
सत को खोजत मैं फिरूँ, सतिया न मिलै न कोय । जब सत को सतिया मिले, विष तजि अमृत होय ॥
देश-देशान्तर मैं फिरूँ, मानुष बड़ा सुकाल । जा देखै सुख उपजै, वाका पड़ा दुकाल ॥
कबीर गुरु की भक्ति बिन, राजा ससभ होय । माटी लदै कुम्हार की, घास न डारै कोय ॥
कबीर गुरु की भक्ति बिन, नारी कूकरी होय । गली-गली भूँकत फिरै, टूक न डारै कोय ॥
जो कामिनि परदै रहे, सुनै न गुरुगुण बात । सो तो होगी कूकरी, फिरै उघारे गात ॥
चौंसठ दीवा जोय के, चौदह चन्दा माहिं । तेहि घर किसका चाँदना, जिहि घर सतगुरु नाहिं ॥
हरिया जाने रूखाड़ा, उस पानी का नेह । सूखा काठ न जानिहै, कितहूँ बूड़ा गेह ॥
झिरमिर झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेह । माटी गलि पानी भई, पाहन वाही नेह ॥
कबीर ह्रदय कठोर के, शब्द न लागे सार । सुधि-सुधि के हिरदे विधे, उपजै ज्ञान विचार ॥
कबीर चन्दर के भिरै, नीम भी चन्दन होय । बूड़यो बाँस बड़ाइया, यों जनि बूड़ो कोय ॥
पशुआ सों पालो परो, रहू-रहू हिया न खीज । ऊसर बीज न उगसी, बोवै दूना बीज ॥
कंचन मेरू अरपही, अरपैं कनक भण्डार । कहैं कबीर गुरु बेमुखी, कबहूँ न पावै पार ॥
साकट का मुख बिम्ब है निकसत बचन भुवंग । ताकि औषण मौन है, विष नहिं व्यापै अंग ॥
शुकदेव सरीखा फेरिया, तो को पावे पार । बिनु गुरु निगुरा जो रहे, पड़े चौरासी धार ॥
कबीर लहरि समुन्द्र की, मोती बिखरे आय । बगुला परख न जानई, हंस चुनि-चुनि खाय ॥
साकट कहा न कहि चलै, सुनहा कहा न खाय । जो कौवा मठ हगि भरै, तो मठ को कहा नशाय ॥
साकट मन का जेवरा, भजै सो करराय । दो अच्छर गुरु बहिरा, बाधा जमपुर जाय ॥
कबीर साकट की सभा, तू मति बैठे जाय । एक गुवाड़े कदि बड़ै, रोज गदहरा गाय ॥
संगत सोई बिगुर्चई, जो है साकट साथ । कंचन कटोरा छाड़ि के, सनहक लीन्ही हाथ ॥
साकट संग न बैठिये करन कुबेर समान । ताके संग न चलिये, पड़ि हैं नरक निदान ॥
टेक न कीजै बावरे, टेक माहि है हानि । टेक छाड़ि मानिक मिलै, सत गुरु वचन प्रमानि ॥
साकट सूकर कीकरा, तीनों की गति एक है । कोटि जतन परमोघिये, तऊ न छाड़े टेक ॥
निगुरा ब्राह्म्ण नहिं भला, गुरुमुख भला चमार । देवतन से कुत्ता भला, नित उठि भूँके द्वार ॥
हरिजन आवत देखिके, मोहड़ो सूखि गयो । भाव भक्ति समझयो नहीं, मूरख चूकि गयो ॥
खसम कहावै बैरनव, घर में साकट जोय । एक धरा में दो मता, भक्ति कहाँ ते होय ॥
घर में साकट स्त्री, आप कहावे दास । वो तो होगी शूकरी, वो रखवाला पास ॥
आँखों देखा घी भला, न मुख मेला तेल । साघु सो झगड़ा भला, ना साकट सों मेल ॥
कबीर दर्शन साधु का, बड़े भाग दरशाय । जो होवै सूली सजा, काँटे ई टरि जाय ॥
कबीर सोई दिन भला, जा दिन साधु मिलाय । अंक भरे भारि भेटिये, पाप शरीर जाय ॥
कबीर दर्शन साधु के, करत न कीजै कानि । ज्यों उद्य्म से लक्ष्मी, आलस मन से हानि ॥
कई बार नाहिं कर सके, दोय बखत करिलेय । कबीर साधु दरश ते, काल दगा नहिं देय ॥
दूजे दिन नहिं करि सके, तीजे दिन करू जाय । कबीर साधु दरश ते मोक्ष मुक्ति फन पाय ॥
तीजे चौथे नहिं करे, बार-बार करू जाय । यामें विलंब न कीजिये, कहैं कबीर समुझाय ॥
दोय बखत नहिं करि सके, दिन में करूँ इक बार । कबीर साधु दरश ते, उतरैं भव जल पार ॥
बार-बार नहिं करि सके, पाख-पाख करिलेय । कहैं कबीरन सो भक्त जन, जन्म सुफल करि लेय ॥
पाख-पाख नहिं करि सकै, मास मास करू जाय । यामें देर न लाइये, कहैं कबीर समुदाय ॥
बरस-बरस नाहिं करि सकै ताको लागे दोष । कहै कबीर वा जीव सो, कबहु न पावै योष ॥
छठे मास नहिं करि सके, बरस दिना करि लेय । कहैं कबीर सो भक्तजन, जमहिं चुनौती देय ॥
मास-मास नहिं करि सकै, उठे मास अलबत्त । यामें ढील न कीजिये, कहै कबीर अविगत्त ॥
मात-पिता सुत इस्तरी आलस्य बन्धू कानि । साधु दरश को जब चलैं, ये अटकावै आनि ॥
साधु चलत रो दीजिये, कीजै अति सनमान । कहैं कबीर कछु भेट धरूँ, अपने बित्त अनुमान ॥
इन अटकाया न रुके, साधु दरश को जाय । कहै कबीर सोई सन्तजन, मोक्ष मुक्ति फल पाय ॥
खाली साधु न बिदा करूँ, सुन लीजै सब कोय । कहै कबीर कछु भेंट धरूँ, जो तेरे घर होय ॥
सुनिये पार जो पाइया, छाजन भोजन आनि । कहै कबीर संतन को, देत न कीजै कानि ॥
कबीर दरशन साधु के, खाली हाथ न जाय । यही सीख बुध लीजिए, कहै कबीर बुझाय ॥
टूका माही टूक दे, चीर माहि सो चीर । साधु देत न सकुचिये, यों कशि कहहिं कबीर ॥
कबीर लौंग-इलायची, दातुन, माटी पानि । कहै कबीर सन्तन को, देत न कीजै कानि ॥
साधु आवत देखिकर, हँसी हमारी देह । माथा का ग्रह उतरा, नैनन बढ़ा सनेह ॥
साधु शब्द समुद्र है, जामें रत्न भराय । मन्द भाग मट्टी भरे, कंकर हाथ लगाय ॥
साधु आया पाहुना, माँगे चार रतन । धूनी पानी साथरा, सरधा सेती अन्न ॥
साधु आवत देखिके, मन में करै भरोर । सो तो होसी चूह्रा, बसै गाँव की ओर ॥
साधु मिलै यह सब हलै, काल जाल जम चोट । शीश नवावत ढ़हि परै, अघ पावन को पोट ॥
साधु बिरछ सतज्ञान फल, शीतल शब्द विचार । जग में होते साधु नहिं, जर भरता संसार ॥
साधु बड़े परमारथी, शीतल जिनके अंग । तपन बुझावै ओर की, देदे अपनो रंग ॥
आवत साधु न हरखिया, जात न दीया रोय । कहै कबीर वा दास की, मुक्ति कहाँ से होय ॥
छाजन भोजन प्रीति सो, दीजै साधु बुलाय । जीवन जस है जगन में, अन्त परम पद पाय ॥
सरवर तरवर सन्त जन, चौथा बरसे मेह । परमारथ के कारने, चारों धारी देह ॥
बिरछा कबहुँ न फल भखै, नदी न अंचय नीर । परमारथ के कारने, साधु धरा शरीर ॥
सुख देवै दुख को हरे, दूर करे अपराध । कहै कबीर वह कब मिले, परम सनेही साध ॥
साधुन की झुपड़ी भली, न साकट के गाँव । चंदन की कुटकी भली, ना बूबल बनराव ॥
कह अकाश को फेर है, कह धरती को तोल । कहा साध की जाति है, कह पारस का मोल ॥
हयबर गयबर सधन धन, छत्रपति की नारि । तासु पटतरा न तुले, हरिजन की परिहारिन ॥
क्यों नृपनारि निन्दिये, पनिहारी को मान । वह माँग सँवारे पीववहित, नित वह सुमिरे राम ॥
जा सुख को मुनिवर रटैं, सुर नर करैं विलाप । जो सुख सहजै पाईया, सन्तों संगति आप ॥
साधु सिद्ध बहु अन्तरा, साधु मता परचण्ड । सिद्ध जु वारे आपको, साधु तारि नौ खण्ड ॥
कबीर शीतल जल नहीं, हिम न शीतल होय । कबीर शीतल सन्त जन, राम सनेही सोय ॥
आशा वासा सन्त का, ब्रह्मा लखै न वेद । षट दर्शन खटपट करै, बिरला पावै भेद ॥
कोटि-कोटि तीरथ करै, कोटि कोटि करु धाय । जब लग साधु न सेवई, तब लग काचा काम ॥
वेद थके, ब्रह्मा थके, याके सेस महेस । गीता हूँ कि गत नहीं, सन्त किया परवेस ॥
सन्त मिले जानि बीछुरों, बिछुरों यह मम प्रान । शब्द सनेही ना मिले, प्राण देह में आन ॥
साधु ऐसा चाहिए, दुखै दुखावै नाहिं । पान फूल छेड़े नहीं, बसै बगीचा माहिं ॥
साधु कहावन कठिन है, ज्यों खांड़े की धार । डगमगाय तो गिर पड़े निहचल उतरे पार ॥
साधु कहावत कठिन है, लम्बा पेड़ खजूर । चढ़े तो चाखै प्रेम रस, गिरै तो चकनाचूर ॥
साधु चाल जु चालई, साधु की चाल । बिन साधन तो सुधि नाहिं साधु कहाँ ते होय ॥
साधु सोई जानिये, चलै साधु की चाल । परमारथ राता रहै, बोलै बचन रसाल ॥
साधु भौरा जग कली, निशि दिन फिरै उदास । टुक-टुक तहाँ विलम्बिया, जहँ शीतल शब्द निवास ॥
साधू जन सब में रमैं, दुख न काहू देहि । अपने मत गाड़ा रहै, साधुन का मत येहि ॥
साधु-साधु सब एक है, जस अफीम का खेत । कोई विवेकी लाल है, और सेत का सेत ॥
साधु सती औ सिं को, ज्यों लेघन त्यौं शोभ । सिंह न मारे मेढ़का, साधु न बाँघै लोभ ॥
साधु तो हीरा भया, न फूटै धन खाय । न वह बिनभ कुम्भ ज्यों ना वह आवै जाय ॥
साधू-साधू सबहीं बड़े, अपनी-अपनी ठौर । शब्द विवेकी पारखी, ते माथे के मौर ॥
सदा रहे सन्तोष में, धरम आप दृढ़ धार । आश एक गुरुदेव की, और चित्त विचार ॥
दुख-सुख एक समान है, हरष शोक नहिं व्याप । उपकारी निहकामता, उपजै छोह न ताप ॥
सदा कृपालु दु:ख परिहरन, बैर भाव नहिं दोय । छिमा ज्ञान सत भाखही, सिंह रहित तु होय ॥
साधु ऐसा चाहिए, जाके ज्ञान विवेक । बाहर मिलते सों मिलें, अन्तर सबसों एक ॥
सावधान और शीलता, सदा प्रफुल्लित गात । निर्विकार गम्भीर मत, धीरज दया बसात ॥ अगला भाग >>