Sant Seva ParishadSant Seva ParishadSSP · sant seva

Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Chapter 13

मन को अंग

मन को अंग

30 verses

📖 Book View
  1. Kabir 13.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन कै मते न चालिए, छाँड़ि जीव की बाँणिं। ताकू केरे सूत ज्यूँ, उलटि अपूठा आंणिं॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―कबीरदास जी कहते हैं कि हे जीव! तू मन की इच्छानुसार न चल। मन की विषय वासना मे लिप्त रहने की आदत छुडा दे। जिस प्रकार तकुआ का सूत उससे निकाल कर फिर उसी से लपेट दिया जाता है उसी प्रकार तू अपने मन को संसार से विरक्त करके ब्रह्मा से लगा दे।

  2. Kabir 13.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चिंता चिति निबारिये, फिरि बूझिये न कोइ। इंद्री पसर मिटाइये, सहजि मिलैगा सोइ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―अपने मन से संसार की नाना प्रकार की चिन्ताओ को त्याग देने पर फिर किसी की भी परवाह नही रहती है। इन्द्रियो से उत्पन्न विषय वासना रूपी सुख के फैलाव को समाप्त कर देने पर वह परमात्मा बड़ी ही सरलता से प्राप्त हो जाता है। शव्दार्थ―चिन्ता=सासारिक चिन्ताएँ। सहजि=आसानी से।

  3. Kabir 13.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संदर्भ―सासारिक चिन्ताओ को छोड़ देने से परमात्मा स्वयं ही प्राप्त हो जाता है। आसा का ईंधण करूॅ, मनसा करूॅ विभूति। जोगी फेरी फिल करौ, यौं बिननाँ वै सूति॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―आशा का परित्याग कर उसको ईंधन के रूप मे प्रयोग कर मनके अहंकार को जला कर भस्म कर दूँ और योगी बनकर संसार से विरक्त होकर परमात्मा की खोज मे इधर-उधर चक्कर काटता रहूँ। इस प्रकार अच्छे कर्मों रूपी सूत को कात करके ही परमात्मा की प्राप्ति सम्भव हो सकती है। विशेष―रूपक अलंकार। ​

  4. Kabir 13.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कबीर सेरी सांकड़ी, चंचल मनवां चोर। गुण गावै लैलीन होइ, कछू एक मन मैं ओर॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―कबीरदास जी कहते हैं कि परमात्मा के समीप पहुँचने का मार्ग बहुत संकरा है। मन चंचल है और चोर के समान लोभी वृत्ति का है। ऊपर से तो यह भगवान के गुणानुवाद गाता है किन्तु आन्तरिक मन मे अनेकानेक इच्छाएं व्याप्त हैं और इसी कारण प्रभु-प्राप्ति मे वाधा पडती है।

  5. Kabir 13.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कबीर मारूॅ मन कूँ, टूक टूक ह्वै जाइ। विप की क्यारी बोह करि, लुणत कहा पछिताइ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―कबीरदास जी कहते हैं कि इस चंचल वृत्ति वाले मन को इतना मारूँगा कि वह टुकडे-टुकडे हो जायगा। पहले तो यह विषय वासना की क्यारी बोता है फिर उसके परिणाम को भोगने के समय क्यो पछिनाता है। कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ेगा।

  6. Kabir 13.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    इस मन कौ विसमल करौ, दीठा करौं अदीठ। जे सिर राखौं आपणां, तौ पर सिरिज अंगीठ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―कबीरदास जी कहते हैं कि अपने चंचल मन को अधमरा कर सासारिक विषयों से विरक्त कर निराकार अदृष्ट प्रभु के दर्शन करूँगा यदि अपने सिर की रक्षा करनी है तो उसके ऊपर अगारे के समान कठिन से कठिन यातनाओ को भी सहन करना पड़ेगा।

  7. Kabir 13.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन जाणैं सब घात, जाणत ही औंगुण करैं। काहे की कुसलात, कर दीपक कुवै परैं॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―मन सब बातो को जानते हुए भी नाना प्रकार की बुराइयो को करता है। यदि हाथ मे दीपक लेकर चलने वाला भी कुएँ में गिर पड़े तो उस दीपक से क्या लाभ? उसी प्रकार जान बूझ कर भी यदि मन बुराई करता है तो उसे जानने से क्या लाभ? शव्दार्थ―जाणत जानना। कुवै=कुएँ मे।

  8. Kabir 13.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हिरदा भीतरि आरसी, मुख देषणां न जाइ। मुख तौ तौपरि देखिये, जे मन की दुविधा जाइ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―हृदय के भीतर ही आत्मा का दर्पण है किन्तु उसमे परमात्मा का मुख दिखाई नहीं पड़ता है यदि मन सांसारिक विषयों से अपनी चचलता का परित्याग कर दे तो ब्रह्म के दर्शन हो सकते हैं। शव्दार्थ―आरसी=दर्पण, शीशा।

  9. Kabir 13.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन दीयाँ मन पाइए, मन बिना मन नहीं होइ। मन उनमन उस अंड ज्यूॅ, अनल अकासां जौइ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―परमात्मा का प्रेम उसमे मन लगाने से ही प्राप्त हो सकता है। यह सत्य है कि जब तक भक्त का मन ईश्वर की ओर नहीं लगता तब तक ईश्वर का मन भी भक्त की ओर नही झुकता किन्तु जब तक मन को इस संसार के भोगो मे लगाए रहोगे तब तक परमात्मा को प्राप्ति असम्भव ही है। संसार से उदासी न हुआ मन उस सृष्टि के समान है जैसे आकाश में ब्रह्म की ज्योति प्रकाशित होती है।

  10. Kabir 13.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन गोरख मन गोविन्दौ, मन ही औघड़ होइ। जे मन राखैं जतनकरि, तौ आपैं करता सोइ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―मन ही गोरखनाथ है मन हो पर ब्रह्म है और मन ही औघड़ नाथ है। मन ही इन पदों पर पहुँचाने वाला है। यदि मन प्रयत्न-पूर्वक वश में रखा जाये तो यही इस चराचर लोक का कर्ता, नियामक ब्रह्म बन सकता है। ​

  11. Kabir 13.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संदर्भ―मन को वश मे करने पर ही उच्चतम स्थान मिलता है। एक ज दोसत हम किया, जिस गलि लाल कबाइ। सब जग धोबी धोई मरै, तौ भी रंग न जाय॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    मैंने एक ऐसा मित्र बनाया है कि जिसके गले मे लाल कपडा बंधा हुआ है अर्थात् जो प्रेम के रग से ओत-प्रोत है। यह प्रेम का रंग इतना पक्का है कि संसार के सब धोवी मिल करके भो यदि इसके रंग को धोकर छुडाना चाहें तो नहीं छुड़ा सकते हैं।

  12. Kabir 13.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पाँणीं हीं तैं पातला, धूंवाँ हीं तैं भींण। पवनाँ वेगि उतावला, सोदोसत कविरै कीन्ह॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―कबीरदास जी कहते हैं कि जो पानी से भी पतला धुएं से भी हल्का, और पवन के वेग से भी अधिक वेग वाला है ऐसे परमात्मा से मित्रता की है।

  13. Kabir 13.13
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संदर्भ―कबीरदास ने निराकार ब्रह्म से मित्रता जोड़ी है। उसी के गुरणो का वखान है। कबीर तुरी पलाँणियाँ, चाबक लीया हाथि। दिवस थकाँ साँई मिलौं, पीछे पड़िहै राति॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―कबीरदास जी कहते हैं कि मैंने अपने मन रूपी घोड़े को कस करके, पलाद करके, सयम के चाबुक को अपने हाथ में ले लिया है अर्थात् मन पर पूर्ण रूपेण नियन्त्रण कर लिया है। मैं यह चाहता हूँ कि जीवन रूपी दिन का अंत होने के समय तक ही अर्थात् इसी जीवन मे ही परमात्मा के दर्शन कर लूँ क्योकि फिर तो मृत्यु रूपी रात्रि आ जायेगी और जीव को अचेत कर देगी।

  14. Kabir 13.14
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संदर्भ―इसी जीवन मे परमात्मा के दर्शन करने के लिए मनरूपी घोड़े को कसने के लिए संयम का चाबुक लेना पडेगा। मनवाँ तौ अधर बस्या, बहुतक झीणां होय। आलोकत सचु पाईया, कबहुॅ न न्यारा सोइ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―मन अत्यन्त क्षीण होकर अधर मे निराधार ब्रह्म में रम गया है। प्रकाशमय ब्रह्म को आभा पाकर मन सुख का अनुभव कर रहा है और अब वह कभी भी ब्रह्म से अलग नहीं हो सकता है। शव्दार्थ=निराधार। सच, सत्य ब्रह्म।

  15. Kabir 13.15
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन न मर्या मन करि, सके न पच प्रहारि। सील साच सरधा नहीं, इन्द्री अजहुॅ उधारि॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―हे जीव! तूने न तो मन को वश मे किया है और न काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह को ही प्रहार कर नष्ट किया है। शील, सत्य, और श्रद्धा आदि सद् गुणो का भी लोप हो गया है। कबीरदास जी कहते हैं कि यदि मन इन्द्रियो पर आज भी अपनापूर्ण अधिकार कर ले तो उसका भवसागर से उद्धार हो सकता है, अन्यथा नही।

  16. Kabir 13.16
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संदर्भ―बिना इन्द्रियो पर अधिकार किए भवसागर से पार पान कठिन है। कबीर मन बिकरै पड़ या, गया स्वाद कै साथि। गलका खाया वरजता, अब क्यूँ आवै हाथि॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―कबीरदास जी कहते हैं कि मन विषय-वासना के विकारो मे पड़ा हुआ है वह नानाप्रकार के स्वादो के उपभोग मे पढा हुआ है। जो वस्तु गले तक पहुँच गई है उसके लिए अब मना करने से क्या लाभ हो सकता है। इसी प्रकार जो मन इन्द्रियों के वश में हो गया है वह अब किसी भी प्रकार हाथ मे नही आ सकता है।

  17. Kabir 13.17
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संदर्भ―मन इन्द्रियो के वश में हो गया है अब वह काबू मे नही आ सकता। कबीर मन गाफिल भया, सुमरिण लागै नाहिं। घणीं सहैगा सासनां, जम की दरगह माहिं॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―कबीरदास जी कहते हैं कि नाना प्रकार की विषय-वासनाओ के पीछे दौडते-दौडते मन इतना गाफिल हो गया है कि ईश्वर के नाम-स्मरण मे उसका मन ही नही लगता है। किन्तु उसे अपने इन पाप कर्मों का भोग यमलोक मे जाकर यातना सहकर सहना पड़ेगा।

  18. Kabir 13.18
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ​⁠सौंदर्भ―मनको सांसारिक विषय भोगो के बदले नरक मे यातनाएं भोगनी पढ़ेगी। कोटि कर्म पल मैं करै, बहु मन विषिया स्वादि। सतगुर सबद न मानई, जनम गॅवाया बादि॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―यह मन विषयों के स्वाद मे इतना रमण करने लगा है कि पल भर मे हो करोडो दुष्कर्म कर डालता है। और सतगुरु द्वारा दिये गए उपदेशो की अवहेलना करके व्यर्थं मे ही जीवन को नष्ट कर डाला है।

  19. Kabir 13.19
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सौंदर्भ―मन विषय वासना मे पड़ कर अपना सर्वस्व ही गंवा बैठा है। मैमंता मन मारि रे, घटहीं मांहै घेरि। जबहीं चालै पीठि दे, अंकुस दे दे फेरि ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    हे जीव! तू अपने मदमस्त मन को अपने हृदय के भीतर ही घेर कर मार दे। और जब भी यह परमात्मा से विमुख होकर इधर-उधर भागने का प्रयत्न करे उसी समय ईश्वर-स्मरण और सयम का अकुश लेकर इसको उचित मार्ग पर लगा देना चाहिए

  20. Kabir 13.20
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सौंदर्भ―मन को सयम रूपी अंकुश से मार देना चाहिए। मैमंता मन मारि रे, नॉन्हाँ करि करि पीसि। तव सुख पावै सुंदरी, ब्रह्म झलकै सीसि॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―मदमस्त हाथी रूपी मन को संयम के द्वारा इतना कस कर मारो कि सूक्ष्मता को प्राप्त हो जाय। कर्मों को बारीक आटे की तह पीसना चाहिए। तभी आत्मा रूपी सुन्दरी को सुख प्राप्त होगा और सिर से ब्रह्म ज्योति का प्रकाश छिटकता रहेगा । ​ शव्दार्थ―पुन्दरी=आत्मा।

  21. Kabir 13.21
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कागद केरो नाॅव री, पांणी केरी गंग। कहै कबीर कैसे तिरूँ, पंच कुसंगी संग॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―मनुष्य का शरीर कागज की नाव के समान है और यह ससाय रूपी सरिता माया जल से परिपूर्ण है। कबीरदास जी कहते हैं कि इस अगाध सरिता को इस कागज की क्षणिक नौका से कैसे पार किया जा सकता है फिर साथ मे पाँच इन्द्रियों के रूप मे पंच चोर भी हैं जो अवसर देखते ही अच्छे कर्मों को चोरी भी कर लेते हैं।

  22. Kabir 13.22
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संदर्भ―संसार-सरिता को पार करने के लिए संयम की नौका चाहिए। कबीर यहु मन कत गया, जो मन होता काल्हि। डूंगरि बूठा मेह ज्यूँ, गया, निबांणां चालि॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―कबीरदास जी कहते हैं कि जो मेरा निर्मल मन कल (भूतकाल) या वह आज कहाँ चला गया मन की वह निर्मलता कहाँ चली गयी जिस प्रकार टीले पर हुई वर्षा क्षण भर के लिए टीले पर रुककर नीचे की ओर बह जाती है उसी प्रकार मन के ऊपर संतो के सदुपदेशो का प्रभाव क्षण भर के लिए तो हुआ किंतु दूसरे हो क्षरण वह उपदेश मन से निकल गए और मन फिर विषयासक्त हो गया। विशेष–दृष्टात अलंकार।

  23. Kabir 13.23
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संदर्भ―मन ब्रह्म की ओर उन्मुख होकर भी माया भिभूत हो जाता है। मृतक कूॅ धीजौं नहीं, मेरा मन बीहै। बाजै बाव बिकार की, भी मूवा जीवै॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―साधक को अपने मन पर पूर्णरूपेण विश्वास नहीं है वह कहता है कि जिस प्रकार मनुष्य मर जाता है उसी प्रकार मैंने अपने मन को विषयो की ओर से मृतक तुल्य बना दिया है किन्तु फिर भी यदि इसके पास विकारो को दुदंभी फिर से वजने लगे तो जीवित व्यक्ति के समान पुनः पाप कर्म करने लगता है।

  24. Kabir 13.24
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संदर्भ―मन मरे हुए आदमी की भाँति मरी हुई अवस्था में भी जीवित रहता है। काटी कूटी मछली छीकै धरी चहोड़ि। कोई एक अपिर मन बस्या; दह में पड़ी बहोड़॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―मन रूपी मछली को काट कूटकर किसी प्रकार विषय वासना से रहित कर अपने वश मे करके शून्य रूपी छीके मे रखा था किंतु इतने पर भी उसमे वासना का कोई अक्षर अवशिष्ट रह गया था इसलिए वह मन रूपी मछली साधना के छीके से पुनः वासना के जल मे आकर गिर पड़ी। मन फिर विषयो मे आसक्त हो गया।

  25. Kabir 13.25
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ​ संदर्भ―मन सयमित होने पर भी वासना के अवशेष से विकार ग्रस्त हो जाता है। कबीर मन पंषी भया; बहुतक चढ़्या अकास। उहाँ ही ते गिरि पड़्या; मन माया के पास॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―ईश्वर को प्राप्त करने के लिए कबीरदास कहते हैं कि मेरा मन पक्षी की भाँति आकाश तक शून्य तक विचरण करने गया था किन्तु माया के प्रभाव से जब वह वहाँ से गिरा तो बीच मे कही रुका हो नही ठीक नीचे आकर माया के पास ही गिरा। विशेष―रूपक अलंकार।

  26. Kabir 13.26
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संदर्भ―मन रूपी पक्षी माया के प्रभाव से नीचे गिर पड़ता है। भगति दुबारा संकड़ा, राई दुसवैं भाइ। मन तो मैंगल ह्वै रहयो; क्यूॅ करि सकै समाइ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―भक्ति के मार्ग का दरवाजा इतना सकीर्ण है कि वह राई के दशमाश के बराबर है और उसमे प्रवेश करने वाला मन मदमस्त हाथी के समान है फिर वह उस भक्ति के मार्ग में प्रवेश कैसे पा सकता है?

  27. Kabir 13.27
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संदर्भ―भक्ति के सकीर्ण मार्ग मे मन रूपी हाथी कैसे जा सकता है? करता था तौ क्यूॅ रहया, अब करि क्यूॅ पछताय। बोवै पेड़ बबूल का, अंब कहाँ ते खाय॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―हे जीव! कर्म करते समय तुझे इस बात का बोध क्यो नही हुआ कि बुरे कर्म नहीं करने चाहिए इनका परिणाम बुरा होगा और यदि अब बुरे कर्म किए ही हैं तो फिर पछताने से क्या लाभ? उसके परिणाम तो भोगने ही पड़ेंगे। यदि तूने कुकर्मं रूपी बबूल के वृक्ष लगाए हैं तो खाने के लिए मीठे आम कहाँ से प्राप्त हो सकते हैं। ​ विशेष―तुलना कीजिये― कोउ न काहु सुख दुख कर दाता। निज कृत कर्मं भोग सुनु भ्राता॥ मानस-अरण्यकाण्ड शव्दार्थ―अब―आम।

  28. Kabir 13.28
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संदर्भ―कर्मों के अनुसार ही फल की प्राप्ति होती है। काया देवल मन धजा, बिषै लहरि फहराइ। मग चाल्यां देवल चलै, ताका सर्बस जाइ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―शरीर रूपी मन्दिर है और उसके ऊपर फहराने वाली ध्वजा मन है। और ध्वजा विषय वासना की चंचल वायु लहरो से फहरने लगती है यदि शरीर रूपी मंदिर मन रूपीध्वजा के कहने से चलायमान हो जाता है तो समझ लेना चाहिए कि उसका सर्वस्व नष्ट हो जायगा।

  29. Kabir 13.29
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मनह मनोर्थ छाँड़ि दे, तेरा किया न होइ। पाँणी मैं घीव निकसै, तौ रूखा खाइ न कोई॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―मन की इच्छाओ का परित्याग कर देना चाहिए। क्यो कि जो कुछ मन चाहता है वह सब कुछ पूरा हो जाना सम्भव नहीं है। यदि जल को मथने से ही घो निकलने लगे तो इस संसार मे फिर कोई व्यक्ति बिना घी का सूखा भोजन क्यो करे? किन्तु वास्तविकता यह है कि पानी मे घी निकलता नही। मन की इच्छाएं पूरी होती नही।

  30. Kabir 13.30
    📖 Open verse-by-verse reader#

    काया कसू कमॉणज्यू पेच तत्त करि बाँण। मारौं तौं मन मृग कौ नहीं तो मिथ्या जाँण॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―इस शरीर को इतना अधिक साधना मे प्रेरित कर दूं कि यह धनुष के समान हो जाय फिर उस पर पंच तत्व का वाण चलाकर मनरूपी मृग को मार डालूँ तब तो मुझे ठीक समझना अन्यथा मेरी उपदेशो को मिथ्या हो समझना। ​ विशेष―महात्मा तुलसीदास ने पंचतत्वो की संख्या इस प्रकार गिनाई है― 'छति जल पावक गगन समीरा। पच रचित अति अधम सरीरा॥ मानस—किष्किन्धा काण्ड।