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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

काया कसू कमॉणज्यू पेच तत्त करि बाँण। मारौं तौं मन मृग कौ नहीं तो मिथ्या जाँण॥

Kabir 13.30

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Translations & commentaries(2)

Sūtra Translation

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―इस शरीर को इतना अधिक साधना मे प्रेरित कर दूं कि यह धनुष के समान हो जाय फिर उस पर पंच तत्व का वाण चलाकर मनरूपी मृग को मार डालूँ तब तो मुझे ठीक समझना अन्यथा मेरी उपदेशो को मिथ्या हो समझना। ​ विशेष―महात्मा तुलसीदास ने पंचतत्वो की संख्या इस प्रकार गिनाई है― 'छति जल पावक गगन समीरा। पच रचित अति अधम सरीरा॥ मानस—किष्किन्धा काण्ड।

Bhāṣya Commentary

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―उपदेश को क्रियान्वित भी करना चाहिए।