―मनुष्य का शरीर कागज की नाव के समान है और यह ससाय रूपी सरिता माया जल से परिपूर्ण है। कबीरदास जी कहते हैं कि इस अगाध सरिता को इस कागज की क्षणिक नौका से कैसे पार किया जा सकता है फिर साथ मे पाँच इन्द्रियों के रूप मे पंच चोर भी हैं जो अवसर देखते ही अच्छे कर्मों को चोरी भी कर लेते हैं।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
कागद केरो नाॅव री, पांणी केरी गंग। कहै कबीर कैसे तिरूँ, पंच कुसंगी संग॥
Kabir 13.21
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
―गंग = गगां, सरिता। पंच=पंचेन्द्रियो।