―कबीरदास जी कहते हैं कि जो मेरा निर्मल मन कल (भूतकाल) या वह आज कहाँ चला गया मन की वह निर्मलता कहाँ चली गयी जिस प्रकार टीले पर हुई वर्षा क्षण भर के लिए टीले पर रुककर नीचे की ओर बह जाती है उसी प्रकार मन के ऊपर संतो के सदुपदेशो का प्रभाव क्षण भर के लिए तो हुआ किंतु दूसरे हो क्षरण वह उपदेश मन से निकल गए और मन फिर विषयासक्त हो गया। विशेष–दृष्टात अलंकार।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ―संसार-सरिता को पार करने के लिए संयम की नौका चाहिए। कबीर यहु मन कत गया, जो मन होता काल्हि। डूंगरि बूठा मेह ज्यूँ, गया, निबांणां चालि॥
Kabir 13.22
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
डूगरि=टोला। निबाँणाँ चालि=नीचे को ओर चल कर।