―मन अत्यन्त क्षीण होकर अधर मे निराधार ब्रह्म में रम गया है। प्रकाशमय ब्रह्म को आभा पाकर मन सुख का अनुभव कर रहा है और अब वह कभी भी ब्रह्म से अलग नहीं हो सकता है। शव्दार्थ=निराधार। सच, सत्य ब्रह्म।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ―इसी जीवन मे परमात्मा के दर्शन करने के लिए मनरूपी घोड़े को कसने के लिए संयम का चाबुक लेना पडेगा। मनवाँ तौ अधर बस्या, बहुतक झीणां होय। आलोकत सचु पाईया, कबहुॅ न न्यारा सोइ॥
Kabir 13.14
Audio
Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
ब्रह्म की प्राप्ति ज्ञान के प्रकाश से ही सम्भव है।