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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

मन कै मते न चालिए, छाँड़ि जीव की बाँणिं। ताकू केरे सूत ज्यूँ, उलटि अपूठा आंणिं॥

Kabir 13.1

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Translations & commentaries(3)

Sūtra Translation

Sūtrahi.wikisource· HI

―कबीरदास जी कहते हैं कि हे जीव! तू मन की इच्छानुसार न चल। मन की विषय वासना मे लिप्त रहने की आदत छुडा दे। जिस प्रकार तकुआ का सूत उससे निकाल कर फिर उसी से लपेट दिया जाता है उसी प्रकार तू अपने मन को संसार से विरक्त करके ब्रह्मा से लगा दे।

Bhāṣya Commentary

Bhāṣyahi.wikisource· HI

―जीव ब्रह्म का ही अंग है उसे संसार से हटाकर ब्रह्म मे ही लगा देना चाहिए।

Padārtha Word-meaning

Padārthahi.wikisource· HI

―बाँणि=आदत, स्वभाव। अपूठा= कच्चा।