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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Chapter 10

लै कौ अंग

लै कौ अंग

3 verses

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  1. Kabir 10.1
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    जिहि बन सीह न संचरै, पंषि उड़ै नहीं जाइ। रैनि दिवस का गमि नहिं,तहाँ कबीर रह्या ल्यौ लाइ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―जिस बन मे सिह् नही पहुँच सकता पक्षी भी जहाँ उड़ नही सकते जहाँ रात्रि और दिवस का भी पता नही। सूर्य और चन्द्र्मा का अस्तित्व नही। उस न्थान तक पहुचने के लिए कबीरदास साधना कर रहे हैं।

  2. Kabir 10.2
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    सुरति ठीकुली लेज ल्यो,मन् नित डोलनहार। कॅवल कुँवा मैं प्रेम रस, पीवै बारम्बार॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―सहस्त्र दल रूपी कुएँ मे प्रेम का अमृत मय रस भरा हुआ है। साधक सुरति-स्मृति की ढीकुली और लगन की रस्सी से मनके डोल मे इस रस को भरकर बारम्बार पीता है। विशेष―रुपक अलंकार।

  3. Kabir 10.3
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    गंग जमुना उर अंतरै, सहज सुनि ल्यौ घाट। तहाँ कबीरै मठ रच्या, मुनि जन जोवैं बाट॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    ―उडा और पिंगला नाडियाँ हृदय गंगा और यमुना के समान प्रवाहित हो रही है शून्य मे ध्यान रूपी घाट है। उसी शून्य स्थान मे कबीर दास ने अपने मन को लगा दिया है। मुनि लोग उस स्थान के लिए प्रतीक्षा ही करते रहते हैं।