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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

सुरति ठीकुली लेज ल्यो,मन् नित डोलनहार। कॅवल कुँवा मैं प्रेम रस, पीवै बारम्बार॥

Kabir 10.2

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Translations & commentaries(3)

Sūtra Translation

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―सहस्त्र दल रूपी कुएँ मे प्रेम का अमृत मय रस भरा हुआ है। साधक सुरति-स्मृति की ढीकुली और लगन की रस्सी से मनके डोल मे इस रस को भरकर बारम्बार पीता है। विशेष―रुपक अलंकार।

Bhāṣya Commentary

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―साधक का मन बार-बार ईश्वर का स्मरण करता है।

Padārtha Word-meaning

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―लेज=रस्सी। कमल कुँवा=सहस्त्रदल कमल।