Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Chapter 26
Kavita Kosh दोहावली — पृष्ठ ९
कबीर दोहावली / पृष्ठ ९
99 verses
कुल खोये कुल ऊबरै, कुल राखे कुल जाय । राम निकुल कुल भेटिया, सब कुल गया बिलाय ॥
दुनिया के धोखे मुआ, चला कुटुम की कानि । तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा मसानि ॥
दुनिया सेती दोसती, मुआ, होत भजन में भंग । एका एकी राम सों, कै साधुन के संग ॥
यह तन काँचा कुंभ है, यहीं लिया रहिवास । कबीरा नैन निहारिया, नाहिं जीवन की आस ॥
यह तन काँचा कुंभ है, चोट चहूँ दिस खाय । एकहिं गुरु के नाम बिन, जदि तदि परलय जाय ॥
जंगल ढेरी राख की, उपरि उपरि हरियाय । ते भी होते मानवी, करते रंग रलियाय ॥
मलमल खासा पहिनते, खाते नागर पान । टेढ़ा होकर चलते, करते बहुत गुमान ॥
महलन माही पौढ़ते, परिमल अंग लगाय । ते सपने दीसे नहीं, देखत गये बिलाय ॥
ऊजल पीहने कापड़ा, पान-सुपारी खाय । कबीर गुरू की भक्ति बिन, बाँधा जमपुर जाय ॥
कुल करनी के कारने, ढिग ही रहिगो राम । कुल काकी लाजि है, जब जमकी धूमधाम ॥
कुल करनी के कारने, हंसा गया बिगोय । तब कुल काको लाजि है, चाकिर पाँव का होय ॥
मैं मेरी तू जानि करै, मेरी मूल बिनास । मेरी पग का पैखड़ा, मेरी गल की फाँस ॥
ज्यों कोरी रेजा बुनै, नीरा आवै छौर । ऐसा लेखा मीच का, दौरि सकै तो दौर ॥
इत पर धर उत है धरा, बनिजन आये हाथ । करम करीना बेचि के, उठि करि चालो काट ॥
जिसको रहना उतघरा, सो क्यों जोड़े मित्र । जैसे पर घर पाहुना, रहै उठाये चित्त ॥
मेरा संगी कोई नहीं, सबै स्वारथी लोय । मन परतीत न ऊपजै, जिय विस्वाय न होय ॥
मैं भौंरो तोहि बरजिया, बन बन बास न लेय । अटकेगा कहुँ बेलि में, तड़फि- तड़फि जिय देय ॥
दीन गँवायो दूनि संग, दुनी न चली साथ । पाँच कुल्हाड़ी मारिया, मूरख अपने हाथ ॥
तू मति जानै बावरे, मेरा है यह कोय । प्रान पिण्ड सो बँधि रहा, सो नहिं अपना होय ॥
या मन गहि जो थिर रहै, गहरी धूनी गाड़ि । चलती बिरयाँ उठि चला, हस्ती घोड़ा छाड़ि ॥
तन सराय मन पाहरू, मनसा उतरी आय । कोई काहू का है नहीं, देखा ठोंकि बजाय ॥
डर करनी डर परम गुरु, डर पारस डर सार । डरत रहै सो ऊबरे, गाफिल खाई मार ॥
भय से भक्ति करै सबै, भय से पूजा होय । भय पारस है जीव को, निरभय होय न कोय ॥
भय बिन भाव न ऊपजै, भय बिन होय न प्रीति । जब हिरदै से भय गया, मिटी सकल रस रीति ॥
काल चक्र चक्की चलै, बहुत दिवस औ रात । सुगन अगुन दोउ पाटला, तामें जीव पिसात ॥
बारी-बारी आपने, चले पियारे मीत । तेरी बारी जीयरा, नियरे आवै नीत ॥
एक दिन ऐसा होयगा, कोय काहु का नाहिं । घर की नारी को कहै, तन की नारी जाहिं ॥
बैल गढ़न्ता नर, चूका सींग रू पूँछ । एकहिं गुरुँ के ज्ञान बिनु, धिक दाढ़ी धिक मूँछ ॥
यह बिरियाँ तो फिर नहीं, मनमें देख विचार । आया लाभहिं कारनै, जनम जुवा मति हार ॥
खलक मिला खाली हुआ, बहुत किया बकवाद । बाँझ हिलावै पालना, तामें कौन सवाद ॥
चले गये सो ना मिले, किसको पूछूँ जात । मात-पिता-सुत बान्धवा, झूठा सब संघात ॥
विषय वासना उरझिकर जनम गँवाय जाद । अब पछितावा क्या करे, निज करनी कर याद ॥
हे मतिहीनी माछीरी! राखि न सकी शरीर । सो सरवर सेवा नहीं , जाल काल नहिं कीर ॥
मछरी यह छोड़ी नहीं, धीमर तेरो काल । जिहि जिहि डाबर धर करो, तहँ तहँ मेले जाल ॥
परदा रहती पदुमिनी, करती कुल की कान । घड़ी जु पहुँची काल की, छोड़ भई मैदान ॥
जागो लोगों मत सुवो, ना करूँ नींद से प्यार । जैसा सपना रैन का, ऐसा यह संसार ॥
क्या करिये क्या जोड़िये, तोड़े जीवन काज । छाड़ि छाड़ि सब जात है, देह गेह धन राज ॥
जिन घर नौबत बाजती, होत छतीसों राग । सो घर भी खाली पड़े, बैठने लागे काग ॥
कबीर काया पाहुनी, हंस बटाऊ माहिं । ना जानूं कब जायगा, मोहि भरोसा नाहिं ॥
जो तू परा है फंद में निकसेगा कब अंध । माया मद तोकूँ चढ़ा, मत भूले मतिमंद ॥
अहिरन की चोरी करै, करै सुई का दान । ऊँचा चढ़ि कर देखता, केतिक दुरि विमान ॥
नर नारायन रूप है, तू मति समझे देह । जो समझै तो समझ ले, खलक पलक में खोह ॥
मन मुवा माया मुई, संशय मुवा शरीर । अविनाशी जो न मरे, तो क्यों मरे कबीर ॥
मरूँ- मरूँ सब कोइ कहै, मेरी मरै बलाय । मरना था तो मरि चुका, अब को मरने जाय ॥
एक बून्द के कारने, रोता सब संसार । अनेक बून्द खाली गये, तिनका नहीं विचार ॥
समुझाये समुझे नहीं, धरे बहुत अभिमान । गुरु का शब्द उछेद है, कहत सकल हम जान ॥
राज पाट धन पायके, क्यों करता अभिमान । पड़ोसी की जो दशा, भई सो अपनी जान ॥
मूरख शब्द न मानई, धर्म न सुनै विचार । सत्य शब्द नहिं खोजई, जावै जम के द्वार ॥
चेत सवेरे बाचरे, फिर पाछे पछिताय । तोको जाना दूर है, कहैं कबीर बुझाय ॥
क्यों खोवे नरतन वृथा, परि विषयन के साथ । पाँच कुल्हाड़ी मारही, मूरख अपने हाथ ॥
आँखि न देखे बावरा, शब्द सुनै नहिं कान । सिर के केस उज्ज्वल भये, अबहु निपट अजान ॥
ज्ञानी होय सो मानही, बूझै शब्द हमार । कहैं कबीर सो बाँचि है, और सकल जमधार ॥
जोबन मिकदारी तजी, चली निशान बजाय । सिर पर सेत सिरायचा दिया बुढ़ापै आय ॥
कबीर टुक-टुक चोंगता, पल-पल गयी बिहाय । जिव जंजाले पड़ि रहा, दियरा दममा आय ॥
झूठे सुख को सुख कहै, मानत है मन मोद । जगत् चबैना काल का, कछु मूठी कछु गोद ॥
काल जीव को ग्रासई, बहुत कह्यो समुझाय । कहैं कबीर में क्या करूँ, कोई नहीं पतियाय ॥
निश्चय काल गरासही, बहुत कहा समुझाय । कहैं कबीर मैं का कहूँ, देखत न पतियाय ॥
जो उगै तो आथवै, फूलै सो कुम्हिलाय । जो चुने सो ढ़हि पड़ै, जनमें सो मरि जाय ॥
कुशल-कुशल जो पूछता, जग में रहा न कोय । जरा मुई न भय मुवा, कुशल कहाँ ते होय ॥
जरा श्वान जोबन ससा, काल अहेरी नित्त । दो बैरी बिच झोंपड़ा कुशल कहाँ सो मित्र ॥
बिरिया बीती बल घटा, केश पलटि भये और । बिगरा काज सँभारि ले, करि छूटने की ठौर ॥
यह जीव आया दूर ते, जाना है बहु दूर । बिच के बासे बसि गया, काल रहा सिर पूर ॥
कबीर गाफिल क्यों फिरै क्या सोता घनघोर । तेरे सिराने जम खड़ा, ज्यूँ अँधियारे चोर ॥
कबीर पगरा दूर है, बीच पड़ी है रात । न जानों क्या होयेगा, ऊगन्ता परभात ॥
कबीर मन्दिर आपने, नित उठि करता आल । मरहट देखी डरपता, चौडढ़े दीया डाल ॥
धरती करते एक पग, समुंद्र करते फाल । हाथों परबत लौलते, ते भी खाये काल ॥
आस पास जोधा खड़े, सबै बजावै गाल । मंझ महल से ले चला, ऐसा परबल काल ॥
चहुँ दिसि ठाढ़े सूरमा, हाथ लिये हाथियार । सबही यह तन देखता, काल ले गया मात ॥
हम जाने थे खायेंगे, बहुत जिमि बहु माल । ज्यों का त्यों ही रहि गया, पकरि ले गया काल ॥
काची काया मन अथिर, थिर थिर कर्म करन्त । ज्यों-ज्यों नर निधड़क फिरै, त्यों-त्यों काल हसन्त ॥
हाथी परबत फाड़ते, समुन्दर छूट भराय । ते मुनिवर धरती गले, का कोई गरब कराय ॥
संसै काल शरीर में, विषम काल है दूर । जाको कोई जाने नहीं, जारि करै सब धूर ॥
बालपना भोले गया, और जुवा महमंत । वृद्धपने आलस गयो, चला जरन्ते अन्त ॥
बेटा जाये क्या हुआ, कहा बजावै थाल । आवन-जावन होय रहा, ज्यों कीड़ी का नाल ॥
ताजी छूटा शहर ते, कसबे पड़ी पुकार । दरवाजा जड़ा ही रहा, निकस गया असवार ॥
खुलि खेलो संसार में, बाँधि न सक्कै कोय । घाट जगाती क्या करै, सिर पर पोट न होय ॥
घाट जगाती धर्मराय, गुरुमुख ले पहिचान । छाप बिना गुरु नाम के, साकट रहा निदान ॥
संसै काल शरीर में, जारि करै सब धूरि । काल से बांचे दास जन जिन पै द्दाल हुजूर ॥
ऐसे साँच न मानई, तिलकी देखो जाय । जारि बारि कोयला करे, जमते देखा सोय ॥
जारि बारि मिस्सी करे, मिस्सी करि है छार । कहैं कबीर कोइला करै, फिर दै दै औतार ॥
काल पाय जब ऊपजो, काल पाय सब जाय । काल पाय सबि बिनिश है, काल काल कहँ खाय ॥
पात झरन्ता देखि के, हँसती कूपलियाँ । हम चाले तु मचालिहौं, धीरी बापलियाँ ॥
फागुन आवत देखि के, मन झूरे बनराय । जिन डाली हम केलि, सो ही ब्योरे जाय ॥
मूस्या डरपैं काल सों, कठिन काल को जोर । स्वर्ग भूमि पाताल में जहाँ जावँ तहँ गोर ॥
सब जग डरपै काल सों, ब्रह्मा, विष्णु महेश । सुर नर मुनि औ लोक सब, सात रसातल सेस ॥
कबीरा पगरा दूरि है, आय पहुँची साँझ । जन-जन को मन राखता, वेश्या रहि गयी बाँझ ॥
जाय झरोखे सोवता, फूलन सेज बिछाय । सो अब कहँ दीसै नहीं, छिन में गयो बोलाय ॥
काल फिरे सिर ऊपरै, हाथों धरी कमान । कहैं कबीर गहु ज्ञान को, छोड़ सकल अभिमान ॥
काल काल सब कोई कहै, काल न चीन्है कोय । जेती मन की कल्पना, काल कहवै सोय ॥
काल काम तत्काल है, बुरा न कीजै कोय । भले भलई पे लहै, बुरे बुराई होय ॥
लेना है सो जल्द ले, कही सुनी मान । कहीं सुनी जुग जुग चली, आवागमन बँधान ॥
खाय-पकाय लुटाय के, करि ले अपना काम । चलती बिरिया रे नरा, संग न चले छदाम ॥
खाय-पकाय लुटाय के, यह मनुवा मिजमान । लेना होय सो लेई ले, यही गोय मैदान ॥
गाँठि होय सो हाथ कर, हाथ होय सी देह । आगे हाट न बानिया, लेना होय सो लेह ॥
देह खेह खोय जायगी, कौन कहेगा देह । निश्चय कर उपकार ही, जीवन का फल येह ॥
कहै कबीर देय तू, सब लग तेरी देह । देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह ॥
देह धरे का गुन यही, देह देह कछु देह । बहुरि न देही पाइये, अकी देह सुदेह ॥
सह ही में सत बाटई, रोटी में ते टूक । कहैं कबीर ता दास को, कबहुँ न आवे चूक ॥
कहते तो कहि जान दे, गुरु की सीख तु लेय । साकट जन औ श्वान को, फेरि जवाब न देय ॥