Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Chapter 21
Kavita Kosh दोहावली — पृष्ठ ४
कबीर दोहावली / पृष्ठ ४
87 verses
सबै रसाइण मैं क्रिया, हरि सा और न कोई । तिल इक घर मैं संचरे, तौ सब तन कंचन होई ॥
हरि-रस पीया जाणिये, जे कबहुँ न जाइ खुमार । मैमता घूमत रहै, नाहि तन की सार ॥
कबीर भाठी कलाल की, बहुतक बैठे आई । सिर सौंपे सोई पिवै, नहीं तौ पिया न जाई ॥
त्रिक्षणा सींची ना बुझै, दिन दिन बधती जाइ । जवासा के रुष ज्यूं, घण मेहां कुमिलाइ ॥
कबीर सो घन संचिये, जो आगे कू होइ । सीस चढ़ाये गाठ की जात न देख्या कोइ ॥
कबीर माया मोहिनी, जैसी मीठी खांड़ । सतगुरु की कृपा भई, नहीं तौ करती भांड़ ॥
कबीर माया पापरगी, फंध ले बैठी हाटि । सब जग तौ फंधै पड्या, गया कबीर काटि ॥
कबीर जग की जो कहै, भौ जलि बूड़ै दास । पारब्रह्म पति छांड़ि करि, करै मानि की आस ॥
माया तजी तौ क्या भया, मानि तजि नही जाइ । मानि बड़े मुनियर मिले, मानि सबनि को खाइ ॥
करता दीसै कीरतन, ऊँचा करि करि तुंड । जाने-बूझै कुछ नहीं, यौं ही अंधा रुंड ॥
कबीर पढ़ियो दूरि करि, पुस्तक देइ बहाइ । बावन आषिर सोधि करि, ररै मर्मे चित्त लाइ ॥
मैं जाण्यूँ पाढ़िबो भलो, पाढ़िबा थे भलो जोग । राम-नाम सूं प्रीती करि, भल भल नींयो लोग ॥
पद गाएं मन हरषियां, साषी कह्मां अनंद । सो तत नांव न जाणियां, गल में पड़िया फंद ॥
जैसी मुख तै नीकसै, तैसी चाले चाल । पार ब्रह्म नेड़ा रहै, पल में करै निहाल ॥
काजी-मुल्ला भ्रमियां, चल्या युनीं कै साथ । दिल थे दीन बिसारियां, करद लई जब हाथ ॥
प्रेम-प्रिति का चालना, पहिरि कबीरा नाच । तन-मन तापर वारहुँ, जो कोइ बौलौ सांच ॥
सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप । जाके हिरदै में सांच है, ताके हिरदै हरि आप ॥
खूब खांड है खीचड़ी, माहि ष्डयाँ टुक कून । देख पराई चूपड़ी, जी ललचावे कौन ॥
साईं सेती चोरियाँ, चोरा सेती गुझ । जाणैंगा रे जीवएगा, मार पड़ैगी तुझ ॥
तीरथ तो सब बेलड़ी, सब जग मेल्या छाय । कबीर मूल निकंदिया, कौण हलाहल खाय ॥
जप-तप दीसैं थोथरा, तीरथ व्रत बेसास । सूवै सैंबल सेविया, यौ जग चल्या निरास ॥
जेती देखौ आत्म, तेता सालिगराम । राधू प्रतषि देव है, नहीं पाथ सूँ काम ॥
कबीर दुनिया देहुरै, सीत नवांवरग जाइ । हिरदा भीतर हरि बसै, तू ताहि सौ ल्यो लाइ ॥
मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जाणि । दसवां द्वारा देहुरा, तामै जोति पिछिरिग ॥
मेरे संगी दोइ जरग, एक वैष्णौ एक राम । वो है दाता मुक्ति का, वो सुमिरावै नाम ॥
मथुरा जाउ भावे द्वारिका, भावै जाउ जगनाथ । साथ-संगति हरि-भागति बिन-कछु न आवै हाथ ॥
कबीर संगति साधु की, बेगि करीजै जाइ । दुर्मति दूरि बंबाइसी, देसी सुमति बताइ ॥
उज्जवल देखि न धीजिये, वग ज्यूं माडै ध्यान । धीर बौठि चपेटसी, यूँ ले बूडै ग्यान ॥
जेता मीठा बोलरगा, तेता साधन जारिग । पहली था दिखाइ करि, उडै देसी आरिग ॥
जानि बूझि सांचहिं तर्जे, करै झूठ सूँ नेहु । ताकि संगति राम जी, सुपिने ही पिनि देहु ॥
कबीर तास मिलाइ, जास हियाली तू बसै । नहिंतर बेगि उठाइ, नित का गंजर को सहै ॥
कबीरा बन-बन मे फिरा, कारणि आपणै राम । राम सरीखे जन मिले, तिन सारे सवेरे काम ॥
कबीर मन पंषो भया, जहाँ मन वहाँ उड़ि जाय । जो जैसी संगति करै, सो तैसे फल खाइ ॥
कबीरा खाई कोट कि, पानी पिवै न कोई । जाइ मिलै जब गंग से, तब गंगोदक होइ ॥
माषी गुड़ मैं गड़ि रही, पंख रही लपटाई । ताली पीटै सिरि घुनै, मीठै बोई माइ ॥
मूरख संग न कीजिये, लोहा जलि न तिराइ । कदली-सीप-भुजगं मुख, एक बूंद तिहँ भाइ ॥
हरिजन सेती रुसणा, संसारी सूँ हेत । ते णर कदे न नीपजौ, ज्यूँ कालर का खेत ॥ काजल केरी कोठड़ी, तैसी यहु संसार । बलिहारी ता दास की, पैसिर निकसण हार ॥ 341 ॥
पाणी हीतै पातला, धुवाँ ही तै झीण । पवनां बेगि उतावला, सो दोस्त कबीर कीन्ह ॥
आसा का ईंधण करूँ, मनसा करूँ बिभूति । जोगी फेरी फिल करूँ, यौं बिनना वो सूति ॥
कबीर मारू मन कूँ, टूक-टूक है जाइ । विव की क्यारी बोइ करि, लुणत कहा पछिताइ ॥
कागद केरी नाव री, पाणी केरी गंग । कहै कबीर कैसे तिरूँ, पंच कुसंगी संग ॥
मैं मन्ता मन मारि रे, घट ही माहैं घेरि । जबहीं चालै पीठि दे, अंकुस दै-दै फेरि ॥
मनह मनोरथ छाँड़िये, तेरा किया न होइ । पाणी में घीव नीकसै, तो रूखा खाइ न कोइ ॥
एक दिन ऐसा होएगा, सब सूँ पड़े बिछोइ । राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होइ ॥
कबीर नौबत आपणी, दिन-दस लेहू बजाइ । ए पुर पाटन, ए गली, बहुरि न देखै आइ ॥
जिनके नौबति बाजती, भैंगल बंधते बारि । एकै हरि के नाव बिन, गए जनम सब हारि ॥
कहा कियौ हम आइ करि, कहा कहैंगे जाइ । इत के भये न उत के, चलित भूल गँवाइ ॥
बिन रखवाले बाहिरा, चिड़िया खाया खेत । आधा-परधा ऊबरै, चेति सकै तो चैति ॥
कबीर कहा गरबियौ, काल कहै कर केस । ना जाणै कहाँ मारिसी, कै धरि के परदेस ॥
नान्हा कातौ चित्त दे, महँगे मोल बिलाइ । गाहक राजा राम है, और न नेडा आइ ॥
उजला कपड़ा पहिरि करि, पान सुपारी खाहिं । एकै हरि के नाव बिन, बाँधे जमपुरि जाहिं ॥
कबीर केवल राम की, तू जिनि छाँड़ै ओट । घण-अहरनि बिचि लौह ज्यूँ, घणी सहै सिर चोट ॥
मैं-मैं बड़ी बलाइ है सकै तो निकसौ भाजि । कब लग राखौ हे सखी, रुई लपेटी आगि ॥
कबीर माला मन की, और संसारी भेष । माला पहरयां हरि मिलै, तौ अरहट कै गलि देखि ॥
माला पहिरै मनभुषी, ताथै कछू न होइ । मन माला को फैरता, जग उजियारा सोइ ॥
कैसो कहा बिगाड़िया, जो मुंडै सौ बार । मन को काहे न मूंडिये, जामे विषम-विकार ॥
माला पहरयां कुछ नहीं, भगति न आई हाथ । माथौ मूँछ मुंडाइ करि, चल्या जगत् के साथ ॥
बैसनो भया तौ क्या भया, बूझा नहीं बबेक । छापा तिलक बनाइ करि, दगहया अनेक ॥
स्वाँग पहरि सो रहा भया, खाया-पीया खूंदि । जिहि तेरी साधु नीकले, सो तो मेल्ही मूंदि ॥
चतुराई हरि ना मिलै, ए बातां की बात । एक निस प्रेही निरधार का गाहक गोपीनाथ ॥
एष ले बूढ़ी पृथमी, झूठे कुल की लार । अलष बिसारयो भेष में, बूड़े काली धार ॥
कबीर हरि का भावता, झीणां पंजर । रैणि न आवै नींदड़ी, अंगि न चढ़ई मांस ॥
सिंहों के लेहँड नहीं, हंसों की नहीं पाँत । लालों की नहि बोरियाँ, साध न चलै जमात ॥
गाँठी दाम न बांधई, नहिं नारी सों नेह । कह कबीर ता साध की, हम चरनन की खेह ॥
निरबैरी निहकामता, साईं सेती नेह । विषिया सूं न्यारा रहै, संतनि का अंग सह ॥
जिहिं हिरदै हरि आइया, सो क्यूं छाना होइ । जतन-जतन करि दाबिये, तऊ उजाला सोइ ॥
काम मिलावे राम कूं, जे कोई जाणै राखि । कबीर बिचारा क्या कहै, जाकि सुख्देव बोले साख ॥
राम वियोगी तन बिकल, ताहि न चीन्हे कोई । तंबोली के पान ज्यूं, दिन-दिन पीला होई ॥
पावक रूपी राम है, घटि-घटि रह्या समाइ । चित चकमक लागै नहीं, ताथै घूवाँ है-है जाइ ॥
फाटै दीदै में फिरौं, नजिर न आवै कोई । जिहि घटि मेरा साँइयाँ, सो क्यूं छाना होई ॥
हैवर गैवर सघन धन, छत्रपती की नारि । तास पटेतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि ॥
जिहिं धरि साध न पूजि, हरि की सेवा नाहिं । ते घर भड़धट सारषे, भूत बसै तिन माहिं ॥
कबीर कुल तौ सोभला, जिहि कुल उपजै दास । जिहिं कुल दास न उपजै, सो कुल आक-पलास ॥
क्यूं नृप-नारी नींदिये, क्यूं पनिहारी कौ मान । वा माँग सँवारे पील कौ, या नित उठि सुमिरैराम ॥
काबा फिर कासी भया, राम भया रे रहीम । मोट चून मैदा भया, बैठि कबीरा जीम ॥
दुखिया भूखा दुख कौं, सुखिया सुख कौं झूरि । सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि ॥
कबीर दुबिधा दूरि करि, एक अंग है लागि । यहु सीतल बहु तपति है, दोऊ कहिये आगि ॥
कबीर का तू चिंतवै, का तेरा च्यंत्या होइ । अण्च्यंत्या हरिजी करै, जो तोहि च्यंत न होइ ॥
भूखा भूखा क्या करैं, कहा सुनावै लोग । भांडा घड़ि जिनि मुख यिका, सोई पूरण जोग ॥
रचनाहार कूं चीन्हि लै, खैबे कूं कहा रोइ । दिल मंदि मैं पैसि करि, ताणि पछेवड़ा सोइ ॥
कबीर सब जग हंडिया, मांदल कंधि चढ़ाइ । हरि बिन अपना कोउ नहीं, देखे ठोकि बनाइ ॥
मांगण मरण समान है, बिरता बंचै कोई । कहै कबीर रघुनाथ सूं, मति रे मंगावे मोहि ॥
मानि महतम प्रेम-रस गरवातण गुण नेह । ए सबहीं अहला गया, जबही कह्या कुछ देह ॥
संत न बांधै गाठड़ी, पेट समाता-तेइ । साईं सूं सनमुख रहै, जहाँ माँगे तहां देइ ॥
कबीर संसा कोउ नहीं, हरि सूं लाग्गा हेत । काम-क्रोध सूं झूझणा, चौडै मांड्या खेत ॥
कबीर सोई सूरिमा, मन सूँ मांडै झूझ । पंच पयादा पाड़ि ले, दूरि करै सब दूज ॥
जिस मरनै यैं जग डरै, सो मेरे आनन्द । कब मरिहूँ कब देखिहूँ पूरन परमानंद ॥