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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · Chapter 1

गुरुदेव कौ अंग

गुरुदेव कौ अंग

34 verses

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  1. Kabir 1.1
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    सतगुरु सवाँन को सगा, सोधी सई न दाति। हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाति॥

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    सतगुरु के समान कौन सा है, कौन अपना है। उसके समान कोई भी शोधक नहीं है। वह अमोघ, अजस्त्रदाता है। हरिजी अर्थात् भगवान की सदृश कौन हितैषी है और हरिजन अर्थात् वैष्णवजन के समान कोई जाति नहीं है, उसके समान कोई कुलीन नहीं है।

  2. Kabir 1.2
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    बलिहारी गुरु आपणैं, द्यौं हाड़ी कै वार। जिनि मानिप तैं देवता, करत न लागी वार॥

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    सतगुरु के श्री चरणों पर मैं अपने इस शरीर को अधम पचतत्वों से विनिर्मित शरीर को जो हाटी के सदृश निःसार है—शतशः बार न्यौछावर करता हुँ। सतगुरु को मुझ दोषों से अभिशप्त वासनाओं से ग्रस्त अधर्म प्राणी को दिव्यता प्रदान करने में बिलम्ब न लगा। यही उनकी महत्ता है।

  3. Kabir 1.3
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    सतगुरु की महिमा अनँत अनँत उपकार। लोचन अनँत उघाड़िया अनँत दिखावण्हआर॥

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    सतगुरु की महिमा अनन्त है। उनकी महत्ता का वर्णन नहीं हो सकता है। उन्होंने शिष्य के प्रति अनन्त उपकार किए हैं। उन्हीं की असीम कृपा से अनन्त अर्थात-ज्ञान के चक्षु उद्घाटित होगा। उनकी असीम कृपा से अनंत, निराकार निर्विकार ब्रह्म के दर्शन हो गए।

  4. Kabir 1.4
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    ​ संदर्भ—सतगुरु दिव्यशक्ति से सम्पन्न है। उनकी महत्ता, महिमा अनिर्वचनीय है। उन्होंने अनन्त कृपा करके शिष्य को अपरिमेय शक्ति प्रदान की। राम नाम कै पटंतरै देबै कौं कुछ नाँहि। क्या ले गुरु संतोषिए, हौस रही मन माँहि॥

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    सतगुरु ने 'रामनाम' जैसी दिव्य वस्तु का दान शिष्य को दिया। शिष्य के पास प्रतिदान के लिए कोई भी उपयुक्त पदार्थ नहीं है। शिष्य के मन में हौसला, अभिलाषा, आकांक्षा अपूर्ण एवं बलवती बनी हुई है कि सतगुरु के महान् व्यक्तित्व की अनुकूल कौन-सी वस्तु प्रतिदान में दी जाय।

  5. Kabir 1.5
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    संदर्भ—शिष्य के मन में असीम कृतज्ञता की भाव है। वह सतगुरु के प्रति प्रतिदान की इच्छा रखता है, पर गुरुदेव के प्रति क्या समर्पित किया जाय यह संकल्प विकल्प मन में साकार रहता है। उसकी अभिलाषा अपूर्ण ही रह गई। सतगुर के सदकै करूँ दिल अपणीं का साछ। कलियुग हम स्यूँ लड़ि पड़या मुहकम मेरा बाछ॥

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    अपने हृदय की समस्त सत्यता को साक्षी करके, पूर्ण मनोयोग से मैं सद्गुरु के चरणों में अपने को न्यौछावर करता हूँ। कलियुग ने पूर्ण शक्ति के साथ मेरे प्रति आक्रमण किया परन्तु मेरी बाधाएँ बलशालिनी थी। अतः मैं सद्गुरु की कृपा से भवसागर उत्तीर्ण हो गया।

  6. Kabir 1.6
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    संदर्भ— सतगुरु सर्वथा प्रशंसनीय है, वंदनीय है। उसकी महती कृपा से शिष्य कलियुग से पराभूत होने से बच गया। एक जु बाह्या प्रीति सूँ, भीतरि रह्या शरीर॥

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    सतगुरु ने हाथ में धनुष ग्रहण करके तीर बहाना (दया फेंकना) प्रारम्भ किया। एक तीर जो उसने बड़े प्रेम से मेरे प्रति संधान किया, वह मेरे शरीर में घर कर गया। विशेष—प्रस्तुत साखी में कवि ने सतगुरु को सूरमा के रूप मे व्यक्त किया है, जो तीर संधान करने में अत्यन्त कुशल है वह अनवरत रूप से शिष्य के प्रति जो शब्द-बाण को लक्ष्य करता रहा है। परन्तु एक शब्द-बाण उसने बडे़ हित और प्रेम से संधान किया। इस बाण से शिष्य का मर्म आहत हो गया और वह ब्रह्ममय हो गया।

  7. Kabir 1.7
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    सतगुरु साँचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्या एक। लागत ही मैं मिल गया, पड्या कलेजै छेक॥

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    सतगुरु सच्चा शूरवीर है। उसने मेरे प्रति एक ऐसे शब्द-बाण का अनुसंधान किया, किसके प्रभाव से मेरा मर्म आहत हो गया और मैं मेरा खोया हुआ अपनत्व मुझे सम्प्राप्त हो गया। विशेष—शब्द बाण के लगते ही मेरा खोया हुआ अपनत्व प्राप्त हो गया। तात्पर्य है कि मैं जो माया के आकर्षक स्वरुप को देखकर आत्म विस्मृत हो गया था, सतगुरु के शब्द बाण के लगते ही पुनः आपने खोये हुए रूप को प्राप्त हो गया। मैं माया से आवृत्त होने के कारण अपने निर्विकार एवं निराकार स्वरुप को बिसर गया था पर सतगुरु को ऊपर से ज्ञान प्राप्त हुआ और मैं पुनः अपने मौलिक रूप में परिवर्तित हो गया। पड्या कलेजे छेक से तात्पर्य है कलेजा (पर मर्म) आहत हो गया ​शब्दार्थ-साचा=सच्चा।सूरिर्वा=शूरमा।सवद=शब्द वायह =वहाया,फॅका । लगते। पडयाा=पडा-हुआ। छेक प्रभाव डालना।

  8. Kabir 1.8
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    सतगुरु मारया बाण भरि धरि करिसूधी मूठि। श्रंगि उघाडै लागिया,गई दवा सूँ फूटि़॥

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    - सतगुरु ने शक्तिभर शिष्य को लक्ष्य करके वाण मारा। फलता शिष्य के शरीर मे दावाग्नि भी प्ररफुटित हो गई और शिष्य के अगो को उदघाटित करने लगा। विशेष--(१) मार्या वाण भरि से तात्पयं यह है कि सतगुरु ने पूर्ण्शक्ति के साथ वाण मारा। (२) घरि--मूठि-ल साघन करके। (३) अगि- लागिया सातगुरु के शऱीर वाणो ने शिषय के अगो को उदघाटित कर दिया। अर्थात शब्द वारगा ने ममं को आहन कर दिय। (४) गई-फूटि-शब्द वाण के फलतः ज्ञान कि अग्नि दावाग्नि से फैल गई औऱ उसने व्यक्तित्व के असर तत्वो की विनष्ट कर दिया।

  9. Kabir 1.9
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    संदर्भ-- प्रस्तुत साखी मे कवि ने विगत साखो के भाव को अधिक विस्तार के साथ व्यक्त किया है। विगत साखी मे कवि ने सतगुरु के शूरत्व तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व का उल्लेख किया है़। यहाँ उसी भाव का विश्नेषण करते हुए कबीर ने शब्द वाण के तीत्र्व एवं व्यापक प्रभाव को अंकित किया है़। हँसै न बोलै उन्मनी चंचल मेहल्या मारि। कहै कबीर भीतरि भिद्य,सतगुरु कै हथियारि॥

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    भिद्या—भिदा = भेदा = भेद गया। उनमनी = उन्मनी।

  10. Kabir 1.10
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    संदर्भ-- सतगुरु ने पूरी शक्ति के साथ शब्द-वाण को शिष्य के प्रति मारा अौर फलतः प्रम या जान को अग्नि शिष्य के सम्पूर्ण शऱीर मे प्रस्फुतटित हो गई। प्रस्तुत साखी मे कवि ने शब्द वर्ण के प्रभाव को स्पप्ट एवं अधिक विस्तार के साथ प्रकट किया है। शब्द वाण का प्रभाव यह पडा, कि शिष्य उन्मन अवस्या मे प्रविष्ट हो गया और उसका चचल मन पगु या गति-विहीन हो गया। भवार्थ--शब्द वाण रुपी सतगुरु के हथियार ने शिष्य के अन्तस य मर्म को गई कर दिया। अब वह् हपं-विपाद की मानव से परै होकर संसार से उन्म या उटामीन हो गया और उसका चचंल मन प्रवान्त हो गया। विशेष-- (१)"हसे न बोले" शिष्य शब्द वाण लगते ही शिष्य संसारिक भवनाओ और प्रतिक्रियाओ से ऊपर उठ गया। वह बोतराग य समार की यतर्थ स्यिति को भली प्रकार समान गया और वह संसार से विमुक्त हो उठा, (२) 'उनमनी' से तात्पर्य है उदामिन। (३) 'चचंल' शब्द का प्रयोग संत साहित्य् में में मन के लिये ​प्रयुक्त हुआ है। (४) 'मेल्ह्या' का अर्थ है फेंका। शब्द वाण फेंका और शिष्य के मन को गति विहीन कर दिया। (५) 'भीतर' से तात्पर्य है 'हृदय' अन्तस या मर्म। (६) हथियार—शब्द वाण। गूंगा हुवा बावला, बहरा हुआ कान। पाऊँ मैं पंगुल भया, सतगुर मार्या बाण॥

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    सतगुरु ने ऐसा शब्द वाण मारा है कि शिष्य गूंगा, बावला बधिर एव पंगू हो गया। विशेष—प्रस्तुत साखी में कवि ने रहस्यवादी की उस स्थिति का वर्णन किया है, जिसमें उसकी विभिन्न इन्द्रियों सर्व कार्य को विसर जाती हैं और वे निश्चेष्ट हो जाती है। ज्ञान की ज्योति सम्प्राप्त हो जाने पर, ब्रह्म की अनुभूति परिपूरित हो जाने पर साधक की इन्द्रियाँ लौकिक आनन्द तथा सांसारिक सुखों की ओर से विमुख हो जाती हैं। इस उच्चतम स्थिति पर पहुँचने के अनन्तर उसकी वाक् शक्ति या अभिव्यंजना शक्ति मौन हो गयी, उसकी कर्णेन्द्रिय शब्द ग्रहण की प्रक्रिया को भूल गई और उसे पग पंगुल हो गए। अब वह बावला-सा प्रतीत होने लगा। उसकी मनःस्थिति कुछ ऐसी हो गई कि वह जीवन और संसार से उदासीन ही नहीं पूर्णतया विमुख हो गया। संसार जिसे सुख, जिसे वैभव तथा जिसे महत्व करता है, यह उसे निःसार प्रतीत होने और उनके इस दृष्टिकोण को देख कर सांसारिक उसे बावला समझने लगा। वस्तुतः वही ज्ञानी और तत्व वेत्ता है।

  11. Kabir 1.11
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    पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथि। आगैं थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि॥

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    शिष्य लोकानुमोदित मार्ग का अन्य अनुसरण करता हुआ जा रहा था। परन्तु आगे सतगुरु के दर्शन हुए। उन्होंने ज्ञान का दीपक हाथ दिया। विशेष—सतगुरु की महान अनुकम्पा इसलिए हो कि उसने अन्धानुकरण और लोक वेद प्रतिपादित मार्ग को निःसार बताया और ज्ञान के दीपक के जीवन के मार्ग को परिष्कृत एवं अलौकित किया।

  12. Kabir 1.12
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    दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया विसाहुणां बहुरि न आँवौ हट्ट॥

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    सतगुरु ने प्रेमरूपी तैल से संयुक्त दीपक प्रदान किया, जो न घटने वाली वाती सम्पन्न था। दीपक के प्रकाश में शिष्य ने संसार रूपी बाजार में क्रय-विक्रय पूर्णं किया। अब इस संसार रूपी बाजार में पुनः नहीं आगमन होगा। विशेष—प्रस्तुत साखी में ज्ञान के दीपक में प्रेम का तैल तथा अघट वाती वा उल्लेख किया है। क्रय-विक्रय प्रकाश में किया जाता है। संसार रूपी हाट में अज्ञान का अंधकार, माया का तम चारों ओर प्रसारित है। उस तम या अंधकार के कारण सुकृत का क्रय-विक्रय सम्भावित नहीं था। अब अघट वाती तथा अक्षय तेल युक्त ज्ञान का दीपक प्राप्त हो गया है। अब सुकृत तथा पुण्य का क्रम कर है। अतः जीवन्मुक्त होकर साधक अब पुनर्जन्म के क्रम में नहीं पड़ेगा।

  13. Kabir 1.13
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    ग्यान प्रकारया गुर मिल्या, सो जिनि वीसरि जाइ। जब गोविन्द कृपा करी, तब गुर मिलिया आइ॥

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    गोविन्द की कृपा से मुझे ग्यान के आलोकित या प्रकाशित गुरु मिला। ऐसा सतगुरु अविस्मरणीय है। विशेष—कबीर का यदि यह विश्वास है कि "गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पाँय। बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो बताय," "तो वही कबीर यह भी रखते हैं कि" "जब गोविन्द कृपा करी, तब गुर मिलिया आइ। कबीर को इस बात की प्रसन्नता है कि उसका गुरु ग्यान से पूर्ण और ईश्वर की कृपा से प्राप्त हुआ है।

  14. Kabir 1.14
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    कबीर गुर गरवा मिल्या, रलि गया आटै लूण। 'जाति पाँति कुल सब मिटे, नाँव धरौगे कौंण॥

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    कबीर कहते हैं गौरवमय तथा गम्भीर गुरु मिला। गुरु ने अपने व्यक्तित्व में मुझे एकाकर लिया। मैं उससे मिलकर उसी प्रकार अभिन्न हो गया, यथा आटा एवं नमक मिलकर अभिन्न हो जाता है। इस प्रकार सतगुरु के व्यक्तित्व में एकाकार हो जाने की अनन्तर जाति, कुल और नाम की सकरी सीमाएँ विनष्ट हो गई और मैं विशुद्धात्मा हो गयी। ऐसी शुद्धात्मा का क्या नामकरण होगा? विशेष—आटै-लूण मे तात्पर्य है यथा आटा में मिलकर नमक एकाकार हो जाता है। उसी प्रकार सतगुरु की महानात्मा से मिलकर शिष्य की आत्मा एकाकार हो गई। (२) "गुरगरवा" से तात्पर्य है कि ज्ञान के गौरव मे पूर्ण और गम्भीर (३) जाति... कौंण से तात्पर्य है सांसारिक एवं सामाजिक मान्यताएँ एवं प्रतिबिम्ब एवं विनष्ट हो गये। शिष्य शुद्धात्मा हो गया। (४) नाव... कौंण से तात्पर्य है कि अब शिष्य अनाम, अजात, अवर्ण और अभेद हो गया।

  15. Kabir 1.15
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    संदर्भ—ज्ञान के आलोक से प्रकाशित गुरु मिला। वह गुरु न केवल ज्ञान से सम्पन्न है, वरन् वह गौरव से मुक्त तथा महानात्मा भी है। गुरु के महान व्यक्तित्व से शिष्य अभिभूत हो गया और उसी में समा गया। ज्ञान से आलोकित गुरु के प्रभाव से शिष्य भी ज्ञान सम्पन्न हो गया और उसका जाति, वर्ण, कुल की सब भावना विलीन हो गई। वह शुद्धात्मा के रूप में विचरण करने लगा। जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध। अंधै अंधा ठेलिया, दून्यूं कूप पडंत॥

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    जिस शिष्य का गुरु अन्धा और चेला स्वतः अन्धा है वे दोनों एक दूसरे को ठेलते-ठेलते कुएँ पड़ते हैं। विशेष—प्रस्तुत साखी में कबीर के अज्ञानी गुरु एवं शिष्य की दुर्दशा का उल्लेख किया है। दोनों अज्ञान के कारण एक दूसरे को ठेलते हुए विनाश के कूप में विनष्ट हो जाते हैं।

  16. Kabir 1.16
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    संदर्भ—सतगुरु के ज्ञान से प्रकाशित होकर शिष्य विशुद्धात्मा हो गया। वह इनाम और अजात हो गया। परन्तु जिसका गुरु अन्धा है और चेला भी खरा निरंध है। ऐसे गुरु और शिष्य दोनों ही अन्धे प्राणियों के सदृश विनाश के कुएँ में गिरते हैं। नां गुर मिल्या न सिष भया, लालच खेला डाव। दून्यूं बूड़े धार मैं, चढ़ि पाथर की नाव॥

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    न सत् गुरु मिला, न शिष्य को सत् दीक्षा प्राप्त हुई। लोभ या लालच ने दोनों के प्रति दाँव खेलता रहा। पत्थर की नाव में बैठकर (भवसागर को उत्तीर्ण करने के अभिलाषी) दोनों भवसागर में डूब गए। विशेष—पहले की साखियों में कवि ने सतगुरु के प्रसाद से प्राप्त ज्ञानलोक का उल्लेख किया है। अब यहाँ पर उसने झूठे गुरु के दर्शन से जो अहित होता है, उसका उल्लेख कर दिया है। अज्ञान से अभिशप्त गुरु के कारण शिष्य तो विनष्ट हुआ हो, गुरु भी भवसागर के मध्य में डूब कर विनष्ट हो गया। (२) दून्यूं... मैं—से तात्पर्य है कि दोनों मंझवार में डूब गए। (३) चढ़ि...नाव = से तात्पर्य है माया, लालच या मोह की नौका। ​

  17. Kabir 1.17
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    चौसठ दीवा जोइ करि, चौदह चंदा मांहि। तिहिं घरि किसकौ चानिणौ, जिहि घरि गोविन्द नाहिं॥

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    जिस घर में गोविन्द का निवास नही है, वह घर चौसठ कलाओं और चन्द्रमा की चौदह राशियों से आलोकित होने पर भी, अन्धकार ग्रस्त ही रहेगा। विशेष—प्रस्तुत साखी में दो बातें विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। प्रथम ब्रह्म के ज्ञान का प्रकाश चौसठ कलाओं और चन्द्र की चौदह कलाओं के समन्वित प्रकाश से भी अधिक है। द्वितीय, यह कि हृदय मन्दिर ब्रह्मानुभूति के अभाव में शून्य और अन्धकार से ओत-प्रोत रह जायगा। (२) चौसठि दीवा से तात्पर्य है चौसठ कलाएँ जो अज्ञान के अन्धकार को दूर करती हैं। (३) चौदह चन्दा—चन्द्रमा की १४ कलाएँ जो अन्धकार को नष्ट करती है। (४) घर से तात्पर्य है = शरीर।

  18. Kabir 1.18
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    निस अँधियारी कारणौं, चौरासी लख चन्द। अति आतुर ऊदै किया, तऊ दिष्टि नहि मन्द॥

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    रात्रि के अन्धकार को दूर करने के लिए यदि अत्यन्त आतुरता के साथ ८४ लाख चन्द्र को उदित किया जाय तो भी अन्धकार दूर नहीं होगा, यदि दृष्टि मलिन है। विशेष—यदि दृष्टि मन्द है, या मलीन है तो एक साथ ८४ लाख चन्द्र का प्रकाश भी नहीं दृष्टिगत होगा। चन्द्र और द्वेषों के मध्य में विकारों का ​पर्दा पड़ा है। इसी प्रकार ब्रह्मानुभूति की शक्ति के बिना दृष्टि निर्मल नहीं होगी। (२) निस...कारणौं—रात्रि के अन्धकार के कारण या रात्रि के अन्धकार को दूर करने के लिए। (३) अति आतुर...किया = अत्यन्त आतुरता के साथ अथवा अत्यन्त तीव्रता के साथ चन्द्रमा उदय किया या आयोजित किया। (४) तऊ...मन्द = फिर भी दृष्टि नही है। दृष्टि मन्द ही रहेगी।

  19. Kabir 1.19
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    भली भई जु गुर मिल्या, नहीं वर होती हांणि। दीपक दिष्टि पतंग ज्यूँ पड़ता पूरी जाणि॥

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    अच्छा ही हुआ जो गुरु के दर्शन हो गए नहीं तो बड़ी हानि होती। पतंग रूपी मेरी दृष्टि माया रूपी दीपक पर अवश्य पड़ती और इस प्रकार हर प्रकार से हानि की सम्भावना थी। विशेष—प्रस्तुत साखी में कबीर ने "दीपक दिष्टि पतंग" की सुन्दर कल्पना की है। माया दीपक है और मन या दृष्टि पतंग है। यहाँ पर कवि की अप्रस्तुत योजना औचित्य तथा यथार्थपूर्ण है।

  20. Kabir 1.20
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    माया दीपक नर पतंग, भ्रमि-भ्रमि इवैं पडन्त। कहै कबीर गुर ग्यान थैं, एक आध उतरन्त॥

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    माया रूपी दीपक पर नर (रूपी) पतंग, मंडरा-मंडरा कर गिरता है। परन्तु कबीर का मत है कि गुरु के ज्ञान से (इस विनाश से) एक आध उतर जाता है या उद्धार भी प्राप्त करता है। ​ विशेष—माया के आकर्षक स्वरूप पर मानव उसी प्रकार भ्रम के कारण, या अज्ञान के कारण मडला-मडला कर गिरता है, यथा दीप-शिखा पर पतंग आकर्षित होकर प्राण अर्पित कर देते हैं। (२) "एक आध" से तात्पर्यं विरले। (३) प्रस्तुत साखी में अप्रत्यक्ष रूप से सतगुरु की सामर्थ्य की प्रशंसा की गई है। वह सर्वथा स्तुत्य और बंदनीय है।

  21. Kabir 1.21
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    सतगुर बपुरा क्या करै, जे सिपही मांहै चूक। भावै त्यूं प्रमोधि ले, ज्यूं बँसि बजाई फूंक॥

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    सतगुरु बेचारा क्या करे, यदि शिष्य ही दोष या त्रुटि पूर्ण है। (कुशल) सतगुरु उसी प्रकार से शिष्य को प्रबुद्ध कर लेता है। यथा कुशल बजाने वाला (बहु छिद्रों वाली) बांसुरी को बजा लेता है। विशेष—प्रस्तुत साखी में कवि ने युक्ति संगत बात का उल्लेख किया है। समर्थ सतगुरु शिष्य को वैसे ही उचित मार्ग पर ले आता है। यथा बासुरी बजाने वाला, बहुछिद्र सम्पन्न होने पर भी बासुरी को बजा लेना है।

  22. Kabir 1.22
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    संसै खाया सक्ल जुग, संसा किनहूँ न खद्ध। जै वेधे गुरु अप्पिरां, तिनि संसा चुणि-चुणि खद्ध॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    संशय ने समस्त जगत को खा डाला। पर संशय को कोई न (खा सका या) नष्ट कर सका। परन्तु जिन्हें गुरु के अक्षरों (शब्द वाणी) ने बेधा (या आहत किया) है, उन्होंने ही संशय को चुन-चुन कर (खा डाला या) नष्ट कर डाला। विशेष—गीता में भगवान् कृष्ण का उपदेश है "संशयात्मा विनश्यति।" जो संशय, भ्रम, आशंका से परिपीड़ित हैं, वे नाश को प्राप्त होते हैं। (२) गुरु की वाणी में या शब्द वाणी में वह सामर्थ्य है कि शिष्य के समस्त संशय विनष्ट हो जाते हैं।

  23. Kabir 1.23
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    चेतनि चौकी बैसि करि, सतगुर दीन्हांँ धीर। निरभै होइ निसंक भजि, केवल कहै कबीर॥

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    चैतन्य चौकी पर आसीन होकर सतगुरु ने धैर्य धारण करने का उपदेश दिया। धैर्य के साथ ही सतगुरु ने निर्भर एवं निःशक होकर ईश्वर क आराधना का उपदेश दिया। विशेष—"चैतन्य चौकी" पर बैठकर से तात्पर्य है ज्ञान की चौकी या ज्ञान के आसन पर बैठकर। (२) चेतनि... धीर—ज्ञान के उच्च आसन पर बैठकर सत्गुरु ने शिष्य को धैर्य का धारण करने का आशीर्वाद दिया। (३) "निरभै होइ निसक भजि" से तात्पर्य है निर्भय और शंका रहित होकर आराधना कर। (४) "भजि" से तात्पर्य है 'जप।' यहाँ यह शब्द आदेशात्मक रूप में प्रयुक्त हुआ है। (५) "केवल" का तात्पर्य है अद्वैत ब्रह्म 'केवल' शब्द का प्रयोग संतों ने ब्रह्म अद्वैत अर्थ में किया है।

  24. Kabir 1.24
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    संदर्भ—सतगुरु ने शिष्य के अनन्त लोचन ही नहीं उदघाटित किया, वरन् उसे धैर्य का वरदान भी दिया। साथ ही सतगुरु ने निःशक होकर ईश्वराराधना करने का भी उपदेश दिया। सतगुर मिल्यात का भया, जे मनि पाड़ी भोल। पामि विनंठा कप्पढा, क्या करै विचारी चोल॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    यदि मन ही भूलों से भरा है तो, सतगुरु का मिलना और न मिलना समान है। यदि पास में विनष्ट या फटा। कपड़ा है, तो उसके आधार पर तैयार किया हुआ अधीवस्त्र की क्या उपयोगिता होगी। विशेष—प्रस्तुत साखी में शुलभ एवं सरल अप्रस्तुत योजना के माध्यम से कबीर ने यह कहा है कि यदि शिष्य का मन माया में ही अनुरक्त है तो सतगुरु बेचारे का क्या दोष। फटे हुए कपड़े से शरीर नहीं ढका जाता है। यदि इतना होने पर भी कोई फटे हुए वस्त्र से चोल या चोली मिले और उससे शरीर आवृत नहीं सकते, कपड़े का क्या दोष।

  25. Kabir 1.25
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    संदर्भ—गुरुदेव को अंग की २० वीं साखी में कबीर ने गुरु को अद्वितीय शक्ति का उल्लेख किया है, जिसकी कृपा से एक आध शिष्य का उद्धार होता है। कबीर ने उक्त साखी में कहा है "कहै कबीर गुर ग्यान थै एक आध उबंरत।" यहाँ पर कबीर ने पुनः उमी आशय को अभिनव अप्रस्तुत योजना द्वारा नये कदम में व्यक्त किया है। गुर गोविंद तौ एक है, दूजा यहु आकार। आपा मेट जीवत मरै, तौ पावै करतार॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    गुरु और गोविन्द में अन्तर नहीं है। दोनों एक हैं। उनसे जो कुछ भी भिन्न है वह आकार या माया है। यदि जीते-जी (जीवित रहते हुए) अन्त का (मानव) परित्याग कर देते हैं, ब्रह्मानुभूति से सम्भावित है। विशेष—प्रस्तुत साखी में कबीर ने दो भावों की अभिव्यक्ति की है। प्रथम यह कि सतगुरु और ब्रह्म अभिन्न है। सन्त, साहित्य में यह भाव अनेक बार बड़े उत्साह के साथ व्यक्त किए जाते हैं। द्वितीय भाव यह है कि अहं ब्रह्मानुभूति = या आत्मानुभूति में बाधक होती है। प्रेम एवं ब्रह्माराधना के मार्ग में अहं विनाशकारी। कबीर ने बारम्बार कहा है "यहु तौ घर है प्रेम का खाला का घर नांहि। सीस उतारै भुंई धरै पैठे घर माहिं।

  26. Kabir 1.26
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    सौंदर्भ—गुरु और गोविन्द एक हैं, अभिन्न हैं। गुरु और गोविन्द से भिन्न जो कुछ है वह माया या भ्रम है। प्रेम रस पान करना सरल नहीं है। अहं के जीवित रहते ब्रह्मानुभूति असम्भव है। प्रेम के मार्ग में अहं सबसे बड़ा बाधक है। कबीर ने सच कहा है "पीया चाहै प्रेम रस राखा चाहै मान। एक म्यान में दो खड़ग देखा सुना न कान।" कबीर सतगुर नां मिल्याँ, रही अधूरी सीप। स्वाँग जती का परि करि, घरि घरि मांगैं भीष॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    कबीर दास कहते हैं कि (शिष्य को) सद्गुरु न प्राप्त हुआ और दीक्षा या शिक्षा अपूर्णं रही। यती का वेष धारण करके (अधूरी शिक्षा प्राप्त शिष्य) भिक्षार्जन करते फिरते हैं। विशेष—अनुभव एवं ज्ञान से शून्य गुरु जो शिक्षा देता है, वह अपूर्ण या अधूरी शिक्षा हो अपूर्ण ज्ञान, नीतिकारों ने विनाशकारी माना है। (२) कबीर ने वेश को स्वांग या तमाशा माना है।

  27. Kabir 1.27
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    सतगुर साँचा सूरिवाँ, तातैं लोहिं लुहार। कसणी दे कंचन किया, ताइ लिया ततसार॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    सतगुर सच्चा शूरमा है। यथा लुहार लोहे को दग्ध करके शुद्ध करता है उसी प्रकार साधना की अग्नि में तप्त करके शिष्य को शुद्ध कर लिया है। शिष्य की साधना की कसौटी में कस कर कंचनवत् बना लिया है और सार तत्व को सम्प्राप्त कर लिया है। विशेष— प्रस्तुत साखी में साधना की अग्नि में शिष्य को निर्मल कर लेने का उल्लेख है। माया के असार तत्व साधना की कसौटी से हो दूर किए जा सकते हैं।

  28. Kabir 1.28
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    थापणि पाई विति भई, सतगुर दीन्हीं धीर। कबीर हीरा-बण्जिया, मानसरोवर तीर॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    गुरु से दीक्षा समाप्त हुई और धैर्य का वरदान मिला। कबीर ने मानसरोवर के तट पर हीरा का वाणिज्य किया। विशेष—यहाँ साधना की उन तीन अवस्थाओं का कबीर ने उल्लेख किया है जिसका कवि स्वतः ने अनुभव किया था। थापरिण या स्थापना से अनन्तर धैर्य और तदनन्तर साधक द्वारा हीरा का वाणिज्य। (२) स्थापना या दीक्षा के अनन्तर ही शिष्य को सतगुरु से धैर्य धारण की साधना-पथ पर अग्रसर होने का आशीर्वाद मिला। फलतः साधना में रत रह कर कबीर ने मानसरोवर के तट पर हीरा रूपी हरि का वाणिज्य। (६) थापणि... भई-दीक्षा के अनन्तर थिति मिली।

  29. Kabir 1.29
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    निश्चल निधि मिलाइ तत, सतगुर साहस घीर। निपजी मैं साझी घणां, बाँटे नहीं कबीर॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    सतगुरु द्वारा प्राप्त साहस एव धैर्य के फलतः अमर निधिरूप सार तत्व समाप्त हो गया। परमतत्व के साक्षात्कार से समुत्पन्न आनन्द को बांटने के लिये सभी समुत्सुक है पर कबीर उसे सम्प्रेषित नहीं कर पाता है। विशेष—विगत साखी में कबीर ने हरि के लिए "हीरा" शब्द का प्रयोग किया है और इस साखी में "निहचल निधि" का प्रयोगब्रह्म तत्व के अर्थ में किया है। लौकिक जीवन में हीरा या निधि माया का प्रतीक है। प्रश्न होता है कि कबीर ने माया की इतनी भर्त्सना की है फिर भी माया के प्रतीकों को ब्रह्म तत्व के लिए क्यों प्रयोग किया है बात यह है कि सांसारिक जीवन में हीरा बहुमूल्य वस्तु मानी गई है। उसी प्रकार ब्रह्म साधनात्मक जीवन में बहुमूल्य उपलब्धि है हरि रूपी निधि और हीरा साधनात्मक जीवन में उसी प्रकार बहुमूल्य है यथा लौकिक जीवन के माया के प्रतीक धन या हीरा। (२) तन = तत्व-ब्रह्म तत्व। (३) निपजी ...कबी—ब्रह्मानुभूति का आनन्द यविभाजनीय है असम्प्रेणीय है। वह आनन्द स्वतः अर्जित किया जाता है, उधार में नहीं प्राप्त होता है। ​⁠शब्दार्थ--निहचल = निश्चल । तत = तत्व । निपजी = उपजी । थणा = धना-धनीभूत ।

  30. Kabir 1.30
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    संदर्भ—सतगुरु के अमोघ दान के फलतः जीवन में सब कुछ सब प्राप्य उपलब्ध हो गया। दुर्लभ ब्रह्मानुभूति प्राप्त हो गई। भवसागर में भटकती हुई जीवन नौका को लक्ष्य एवं गंतव्य प्राप्त हो गया ब्रह्मा की अनुभूति का आनन्द अविभाज्य एव अभिव्यक्ति से परे हैं या असम्प्रेषणीय है। चौपडि मांड़ी चौहटै, अरध उरध बाजार । कहै कबीरा रामजन, खोलौ संत विचार ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    -चौराहे पर चौपड़ सुशोभित है । ऊपर नीचे बाजार लगा हुआ कबीर कहते हैं कि सतजन । विवेक पुर्वक इम चौपड के खेल को खेलो । विशेष--अरध बाजार ऊपर नीचे चक्रो का बाजारा बिछा हुआ ही शरीर मे पटचक्र है । मूलाचार प्रथम और सहखार अतिप चक्र है ध्यान रुपी मोहरें या गोटो से साधक खेल रहा है प्रत्येक चक्र पर ध्यान केन्द्रिन करके पुन: आगे बढ़ता है । (२) चौपडि... चोहट शरीर रूपी चौरहे पर चौपड बिछी है । खेलौ सत विचार से तात्पर्य है कि सतो ध्यान पूर्वक इस खेल को खोलो ।

  31. Kabir 1.31
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    संदर्भ--कबीर ने प्रस्तुत अग की साखी १२ एव्ं १६ मे वाणिज्य का उल्लेख किया है । अब प्रस्तुत साखी एवं आगामी साखी मे चौपड़ एवं पासा के खेल का उल्लेख किया । आध्यात्मिक जगत मे चौपड का भिन्न अर्थ होना है । पासा पकड़या प्रेम का, सारी किया सरीर । सतगुर दाव घताइया, खेलै दास कबीर ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    -शरीर को चौपड पर प्रेम का पाना पकड़ कर, सतगुरु के आदेशानुसार कबीर दाव चल रहा है । विशेष--प्रेम का पासा और शरीर का चौपड यही ही यथार्थ और युमिसगत अप्रस्तुत योजना । शरीर के चौपड पर प्रेम के पासे का खेल स्वाभाविक और लौचित्यपूर्ण है। प्रेम के इस खेल मे दाव बचाने वाला या निर्देशन देने वाला सतगुरु ही कुशल गुरु के निर्देशन समप्राप्त हो जाने के कारण शिष्य के लिए परामद का कोइ अवसर नहीं है । ​ "खेलै दास कबीर" मे आत्मविश्वास दृढ़ता तथा सतगुरु पर आस्था का भाव प्रतिबिम्बित होता है ।

  32. Kabir 1.32
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    संदर्भ--"चौपडि माँडी चौहटै अरध अरध बाजार।" ऐसे बाजार मे काबीर राम जन से उपदेश देते हुए कहते हैं "शेलौ संत विचार"। शरीर रूपी चौपड मे प्रेम का पाना फेंकने क रूपक कबीर ने यहाँ पर बड़ी स्पष्टता के साथ व्यक्त किया है । विगत साखी मे कबीर ने इस खेल को खेलने के लिए सहजन के विवेक पर विश्वास रखे हैं। यहाँ सतगुरु के निदॅशन के अनुमार दाय चलने का आदेश कबीर ने बताया है । सतगुरु हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग । बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    सतगुरु ने हमसे प्रसन्न होकर एक प्रसंग कहा। फलतः प्रेम का बादल बरसा और सब अंग आर्द्र हो गए। विशेष–सतगुरु ने शिष्य की योग्यता, सच्चाई और लगन देखकर उसके उपर्युक्त प्रेम का एक प्रसंग प्रस्तुत किया। यह प्रेम का प्रसंग ब्रह्यानुभूति का प्रसंग था। प्रेम का यह प्रसंग इतना प्रभावशाली था कि शिष्य के समस्त अंग उसी से आर्द्र हो गये। इसी भाव से प्रेरित होकर कबीर ने अन्यत्र कहा है कि "लाली मेरे लाल की जित देखूँ तित लाल। लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल।" यहाँ भी प्रेम का अनुराग के रंग में समस्त अंगों के भीग जाने का वर्णन है।

  33. Kabir 1.33
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    कबीर बादल प्रेम का, हम परि बरष्या आइ । अंतरि भीगी आत्मां, हरी भई बनराइ ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    कबीर कहते है कि प्रेम का बादल हम पर आकर बरसा । फलतः अलस और आत्मा उसके प्रभाव से भीग गया और बनराय हरा हो गया। विशेष–अतम माया के आकर्षक आवरण तथा पंच विकारो (काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ) मे अनुरक था। परन्तु यहा प्रेम के जल या सतगुरु के उपदेश जल ​मे वह भीगकर विशुद्ध हो गया । (२) आत्मा, असार, अशुभ और अपवित्र तत्वो से परिवेष्ठित थी । प्रेम के जल से धुल कर वह स्वच्छ हो गई । (३) शरीर रूपी यह चनराय प्रेम के जल से सिंचित होकर हरा-भरा हो गया । (४)"अंतरि भीगो आत्मा" तात्पर्य है अतस (या मन) तथा आत्मा दोनो प्रेम के बादल से आर्द्र हो गये ।

  34. Kabir 1.34
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    पूरे सूँ परचा भया, सब दुःख मेल्या दूरि । निर्मल कीन्ही आत्मा, ताथै सदा हजूर ॥

    अर्थ (Hindi) — hi.wikisource

    पूर्ण ब्रह्य से परिचय हुआ और सब दुःख दूर हो गये । आत्मा निर्मल हो गई और प्रभु ( या ब्रह्म ) से संलग्न हो गई । विशेष—(१) उपनिषदो मे ब्रह्म को पूर्ण अभिव्यक्त करते हुए कहा गया है "पूर्णमदः पूर्णमिदः पूर्णविपूर्ण मुदच्चते । पूर्णस्य् पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।" उपनिषदो के उसी पूर्ण भाव को कबिर ने यहाँ ग्रहण करके उस ईश्वर को "पूरा" कहा है । "एक सद्विप्रा बहुषा बदन्ति ।" उस पूर्ण ब्रह्म से परिचय हो जाने के अनन्तर समस्त दुःख दूर हो गये । निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्य से साक्षात्कार होते ही आत्मा विशुद्ध हो गई । मलीन दारी काम क्रोधादि मे अनुरक्त शरीर मलीन हो गया था, सो अब पवित्र हो गई ।