जिस शिष्य का गुरु अन्धा और चेला स्वतः अन्धा है वे दोनों एक दूसरे को ठेलते-ठेलते कुएँ पड़ते हैं। विशेष—प्रस्तुत साखी में कबीर के अज्ञानी गुरु एवं शिष्य की दुर्दशा का उल्लेख किया है। दोनों अज्ञान के कारण एक दूसरे को ठेलते हुए विनाश के कूप में विनष्ट हो जाते हैं।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ—ज्ञान के आलोक से प्रकाशित गुरु मिला। वह गुरु न केवल ज्ञान से सम्पन्न है, वरन् वह गौरव से मुक्त तथा महानात्मा भी है। गुरु के महान व्यक्तित्व से शिष्य अभिभूत हो गया और उसी में समा गया। ज्ञान से आलोकित गुरु के प्रभाव से शिष्य भी ज्ञान सम्पन्न हो गया और उसका जाति, वर्ण, कुल की सब भावना विलीन हो गई। वह शुद्धात्मा के रूप में विचरण करने लगा। जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध। अंधै अंधा ठेलिया, दून्यूं कूप पडंत॥
Kabir 1.15
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
अवला = अंधा—अज्ञान के अन्धकार से ग्रस्त। खरा = पूर्णतया। निरव = निरा = निरा अन्धा। ठेलिया = ठेलते हुए। दून्यूँ = दोनों। कूप = माया का कूप या विनाश का कूप। पडत = गिरता है।