कबीर कहते है कि प्रेम का बादल हम पर आकर बरसा । फलतः अलस और आत्मा उसके प्रभाव से भीग गया और बनराय हरा हो गया। विशेष–अतम माया के आकर्षक आवरण तथा पंच विकारो (काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ) मे अनुरक था। परन्तु यहा प्रेम के जल या सतगुरु के उपदेश जल मे वह भीगकर विशुद्ध हो गया । (२) आत्मा, असार, अशुभ और अपवित्र तत्वो से परिवेष्ठित थी । प्रेम के जल से धुल कर वह स्वच्छ हो गई । (३) शरीर रूपी यह चनराय प्रेम के जल से सिंचित होकर हरा-भरा हो गया । (४)"अंतरि भीगो आत्मा" तात्पर्य है अतस (या मन) तथा आत्मा दोनो प्रेम के बादल से आर्द्र हो गये ।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
कबीर बादल प्रेम का, हम परि बरष्या आइ । अंतरि भीगी आत्मां, हरी भई बनराइ ॥
Kabir 1.33
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
प्रस्तुत साखी मे कबीर ने पुनः प्रेम के बादल की वर्षा और उसके व्यापक प्रभाव का वर्णन किया है।
Padārtha — Word-meaning
परि = पर । बरष्या = बरसा । अंतरि = अंतर । भई = हुई । चनराइ = चनराय ।