जिस घर में गोविन्द का निवास नही है, वह घर चौसठ कलाओं और चन्द्रमा की चौदह राशियों से आलोकित होने पर भी, अन्धकार ग्रस्त ही रहेगा। विशेष—प्रस्तुत साखी में दो बातें विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। प्रथम ब्रह्म के ज्ञान का प्रकाश चौसठ कलाओं और चन्द्र की चौदह कलाओं के समन्वित प्रकाश से भी अधिक है। द्वितीय, यह कि हृदय मन्दिर ब्रह्मानुभूति के अभाव में शून्य और अन्धकार से ओत-प्रोत रह जायगा। (२) चौसठि दीवा से तात्पर्य है चौसठ कलाएँ जो अज्ञान के अन्धकार को दूर करती हैं। (३) चौदह चन्दा—चन्द्रमा की १४ कलाएँ जो अन्धकार को नष्ट करती है। (४) घर से तात्पर्य है = शरीर।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
चौसठ दीवा जोइ करि, चौदह चंदा मांहि। तिहिं घरि किसकौ चानिणौ, जिहि घरि गोविन्द नाहिं॥
Kabir 1.17
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
सतगुरु के प्रसाद से ज्ञान के प्रकाश से शिष्य आलोकित हो गया। जो गुरु स्वतः ज्ञानालोक से आलोकित है वह शिष्य के व्यक्तित्व से भी वासनाओं के तामसिक अन्धकार को दूर कर सकता है। सतगुरु ने शिष्य के व्यक्तित्व को ब्रह्म के प्रकाश से प्रकाशित कर दिया है। जो ब्रह्म के प्रकाश से आलोकित नहीं है, उनके व्यक्तित्व को कौन सुशोभित कर सकता है।
Padārtha — Word-meaning
चन्दा = चन्द्रमा। चानिणौं = प्रकाश।