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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

सतगुर बपुरा क्या करै, जे सिपही मांहै चूक। भावै त्यूं प्रमोधि ले, ज्यूं बँसि बजाई फूंक॥

Kabir 1.21

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Translations & commentaries(3)

Sūtra Translation

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सतगुरु बेचारा क्या करे, यदि शिष्य ही दोष या त्रुटि पूर्ण है। (कुशल) सतगुरु उसी प्रकार से शिष्य को प्रबुद्ध कर लेता है। यथा कुशल बजाने वाला (बहु छिद्रों वाली) बांसुरी को बजा लेता है। विशेष—प्रस्तुत साखी में कवि ने युक्ति संगत बात का उल्लेख किया है। समर्थ सतगुरु शिष्य को वैसे ही उचित मार्ग पर ले आता है। यथा बासुरी बजाने वाला, बहुछिद्र सम्पन्न होने पर भी बासुरी को बजा लेना है।

Bhāṣya Commentary

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यदि शिष्य माया में अनुरक्त है, या दोषपूर्ण हो तो सतगुरु का क्या दोष। सतगुरु की शिक्षा का कोई भी प्रभाव शिष्य पर नहीं दृष्टिगत होगा यदि वह दोषयुक्त हो। परन्तु निपुर्ण या साधना में सिद्ध सतगुरु दोषों से अभिशप्त शिष्य को भी प्रबुद्ध कर लेता है। तथा कुशल वाद्यकार छिद्रों से युक्त वासुरी के माध्यम् से सुन्दर एव मनोहर राग प्रस्फुटित करता है।

Padārtha Word-meaning

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बपुरा = बेचारा। सिपाही = शिष्य ही। माहै = में है। प्रमोधि = प्रवोध।