संशय ने समस्त जगत को खा डाला। पर संशय को कोई न (खा सका या) नष्ट कर सका। परन्तु जिन्हें गुरु के अक्षरों (शब्द वाणी) ने बेधा (या आहत किया) है, उन्होंने ही संशय को चुन-चुन कर (खा डाला या) नष्ट कर डाला। विशेष—गीता में भगवान् कृष्ण का उपदेश है "संशयात्मा विनश्यति।" जो संशय, भ्रम, आशंका से परिपीड़ित हैं, वे नाश को प्राप्त होते हैं। (२) गुरु की वाणी में या शब्द वाणी में वह सामर्थ्य है कि शिष्य के समस्त संशय विनष्ट हो जाते हैं।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संसै खाया सक्ल जुग, संसा किनहूँ न खद्ध। जै वेधे गुरु अप्पिरां, तिनि संसा चुणि-चुणि खद्ध॥
Kabir 1.22
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
सतगुरु के शब्दों में अद्भुत शक्ति एवं अद्भुत प्रभाव है। उस महानात्मा के शब्दवाणी ने शिष्य में जिन अद्वितीय शक्तियों को समुत्पन्न कर दिया है, उनका उल्लेख पीछे साखियों में हो चुका है। संशय ने समस्त संसार को नष्ट कर दिया है। पर जो सतगुरु के शब्दवाणी से आहत हो चुके हैं, उन्होंने संशय को भी नष्ट करके मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है।
Padārtha — Word-meaning
खद्ध = खाया। जे = जिन्हें। वेधै = बेधा है, या आहत किया है। चुणि = चुनि। ससा = संशय।