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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

संदर्भ— सतगुरु सर्वथा प्रशंसनीय है, वंदनीय है। उसकी महती कृपा से शिष्य कलियुग से पराभूत होने से बच गया। एक जु बाह्या प्रीति सूँ, भीतरि रह्या शरीर॥

Kabir 1.6

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Translations & commentaries(3)

Sūtra Translation

Sūtrahi.wikisource· HI

सतगुरु ने हाथ में धनुष ग्रहण करके तीर बहाना (दया फेंकना) प्रारम्भ किया। एक तीर जो उसने बड़े प्रेम से मेरे प्रति संधान किया, वह मेरे शरीर में घर कर गया। विशेष—प्रस्तुत साखी में कवि ने सतगुरु को सूरमा के रूप मे व्यक्त किया है, जो तीर संधान करने में अत्यन्त कुशल है वह अनवरत रूप से शिष्य के प्रति जो शब्द-बाण को लक्ष्य करता रहा है। परन्तु एक शब्द-बाण उसने बडे़ हित और प्रेम से संधान किया। इस बाण से शिष्य का मर्म आहत हो गया और वह ब्रह्ममय हो गया।

Bhāṣya Commentary

Bhāṣyahi.wikisource· HI

सतगुरु सच्चा सूरमा है। वह शब्दबाण मारने मे अत्यन्त् निपुण है उसने ऐसा शब्द-बाण मारा कि शिष्य का मर्म आहत हो गया और वह तत्व से पूर्णतया परिचित हो गया।

Padārtha Word-meaning

Padārthahi.wikisource· HI

लई-ली, ग्रहण की। करि=कर–हाथ। बाहण=बहाने अर्थात्-फेंकने लगा। बाह्या=बहाया, फेंका। सरीर—शरीर।