पूर्ण ब्रह्य से परिचय हुआ और सब दुःख दूर हो गये । आत्मा निर्मल हो गई और प्रभु ( या ब्रह्म ) से संलग्न हो गई । विशेष—(१) उपनिषदो मे ब्रह्म को पूर्ण अभिव्यक्त करते हुए कहा गया है "पूर्णमदः पूर्णमिदः पूर्णविपूर्ण मुदच्चते । पूर्णस्य् पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।" उपनिषदो के उसी पूर्ण भाव को कबिर ने यहाँ ग्रहण करके उस ईश्वर को "पूरा" कहा है । "एक सद्विप्रा बहुषा बदन्ति ।" उस पूर्ण ब्रह्म से परिचय हो जाने के अनन्तर समस्त दुःख दूर हो गये । निर्गुण, निराकार, निर्विकार ब्रह्य से साक्षात्कार होते ही आत्मा विशुद्ध हो गई । मलीन दारी काम क्रोधादि मे अनुरक्त शरीर मलीन हो गया था, सो अब पवित्र हो गई ।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
पूरे सूँ परचा भया, सब दुःख मेल्या दूरि । निर्मल कीन्ही आत्मा, ताथै सदा हजूर ॥
Kabir 1.34
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
सतगुरु की कृपा से, उसके आशीर्वाद से पूर्ण ब्रह्म से परिचय प्राप्त हो गया और भव सागर के समस्त ताप दूर हो गए । सर्वत्मा से मिल कर यह आत्मा विशुद्ध हो गई ।
Padārtha — Word-meaning
सूं = से । परचा= परिचय । मेला = फैका । दूरि = दूर । हजूरि = हुजूर = स्वमी ।