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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

निश्चल निधि मिलाइ तत, सतगुर साहस घीर। निपजी मैं साझी घणां, बाँटे नहीं कबीर॥

Kabir 1.29

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Sūtra Translation

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सतगुरु द्वारा प्राप्त साहस एव धैर्य के फलतः अमर निधिरूप सार तत्व समाप्त हो गया। परमतत्व के साक्षात्कार से समुत्पन्न आनन्द को बांटने के लिये सभी समुत्सुक है पर कबीर उसे सम्प्रेषित नहीं कर पाता है। विशेष—विगत साखी में कबीर ने हरि के लिए "हीरा" शब्द का प्रयोग किया है और इस साखी में "निहचल निधि" का प्रयोगब्रह्म तत्व के अर्थ में किया है। लौकिक जीवन में हीरा या निधि माया का प्रतीक है। प्रश्न होता है कि कबीर ने माया की इतनी भर्त्सना की है फिर भी माया के प्रतीकों को ब्रह्म तत्व के लिए क्यों प्रयोग किया है बात यह है कि सांसारिक जीवन में हीरा बहुमूल्य वस्तु मानी गई है। उसी प्रकार ब्रह्म साधनात्मक जीवन में बहुमूल्य उपलब्धि है हरि रूपी निधि और हीरा साधनात्मक जीवन में उसी प्रकार बहुमूल्य है यथा लौकिक जीवन के माया के प्रतीक धन या हीरा। (२) तन = तत्व-ब्रह्म तत्व। (३) निपजी ...कबी—ब्रह्मानुभूति का आनन्द यविभाजनीय है असम्प्रेणीय है। वह आनन्द स्वतः अर्जित किया जाता है, उधार में नहीं प्राप्त होता है। ​⁠शब्दार्थ--निहचल = निश्चल । तत = तत्व । निपजी = उपजी । थणा = धना-धनीभूत ।