अच्छा ही हुआ जो गुरु के दर्शन हो गए नहीं तो बड़ी हानि होती। पतंग रूपी मेरी दृष्टि माया रूपी दीपक पर अवश्य पड़ती और इस प्रकार हर प्रकार से हानि की सम्भावना थी। विशेष—प्रस्तुत साखी में कबीर ने "दीपक दिष्टि पतंग" की सुन्दर कल्पना की है। माया दीपक है और मन या दृष्टि पतंग है। यहाँ पर कवि की अप्रस्तुत योजना औचित्य तथा यथार्थपूर्ण है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
भली भई जु गुर मिल्या, नहीं वर होती हांणि। दीपक दिष्टि पतंग ज्यूँ पड़ता पूरी जाणि॥
Kabir 1.19
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
सतगुरु को महिमा अनन्त है। उसने "अनन्त किया उपगार" तथा "लोचन अनन्त उवाडिया अनन्त दिखावरणहार"। तथा "सतगुरु सर्वांन को सगा सोधी सई न दाति।" उसके शब्दवाण "लागत ही मैं मिलि गया पड्या कलेजे छेद"। ऐसे बहुगुणी सतगुरु के न मिलने से बड़ा अहित होता। उसके अभाव में शिष्य की दृष्टि माया रूपी पतंग पर अवश्य पड़ती। और वह आवागमन के क्रम में सदैव के लिए बंध जाता।
Padārtha — Word-meaning
भली अच्छा, कल्याणकारी। भई = हुई, हुआ। तर = तो। हांणि = हानि = नुकसान। दिष्टि = दृष्टि। ज्यूं ज्यों। जाणि = जानि = जान।