कबीर दास कहते हैं कि (शिष्य को) सद्गुरु न प्राप्त हुआ और दीक्षा या शिक्षा अपूर्णं रही। यती का वेष धारण करके (अधूरी शिक्षा प्राप्त शिष्य) भिक्षार्जन करते फिरते हैं। विशेष—अनुभव एवं ज्ञान से शून्य गुरु जो शिक्षा देता है, वह अपूर्ण या अधूरी शिक्षा हो अपूर्ण ज्ञान, नीतिकारों ने विनाशकारी माना है। (२) कबीर ने वेश को स्वांग या तमाशा माना है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
सौंदर्भ—गुरु और गोविन्द एक हैं, अभिन्न हैं। गुरु और गोविन्द से भिन्न जो कुछ है वह माया या भ्रम है। प्रेम रस पान करना सरल नहीं है। अहं के जीवित रहते ब्रह्मानुभूति असम्भव है। प्रेम के मार्ग में अहं सबसे बड़ा बाधक है। कबीर ने सच कहा है "पीया चाहै प्रेम रस राखा चाहै मान। एक म्यान में दो खड़ग देखा सुना न कान।" कबीर सतगुर नां मिल्याँ, रही अधूरी सीप। स्वाँग जती का परि करि, घरि घरि मांगैं भीष॥
Kabir 1.26
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
प्रस्तुत साखी में अपने युग की दुर्व्यवस्था और कुप्रवृत्तियों के प्रति कवि की प्रतिक्रिया अंकित की गई है। संत-साहित्य में तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों के प्रति चेतना के दर्शन होते हैं। यहाँ पर उन स्वांग भरने वालों की ओर संकेत किया गया है जो यती के भेष को धारण कर भिक्षार्जन में प्रवृत्त है।
Padārtha — Word-meaning
स्वांग = तमाशा। जती = यती। परि = पहन। घरि= घर। भीष = भीख = भिक्षा। सीष = सीख = शिक्षा।