सतगुरु ने ऐसा शब्द वाण मारा है कि शिष्य गूंगा, बावला बधिर एव पंगू हो गया। विशेष—प्रस्तुत साखी में कवि ने रहस्यवादी की उस स्थिति का वर्णन किया है, जिसमें उसकी विभिन्न इन्द्रियों सर्व कार्य को विसर जाती हैं और वे निश्चेष्ट हो जाती है। ज्ञान की ज्योति सम्प्राप्त हो जाने पर, ब्रह्म की अनुभूति परिपूरित हो जाने पर साधक की इन्द्रियाँ लौकिक आनन्द तथा सांसारिक सुखों की ओर से विमुख हो जाती हैं। इस उच्चतम स्थिति पर पहुँचने के अनन्तर उसकी वाक् शक्ति या अभिव्यंजना शक्ति मौन हो गयी, उसकी कर्णेन्द्रिय शब्द ग्रहण की प्रक्रिया को भूल गई और उसे पग पंगुल हो गए। अब वह बावला-सा प्रतीत होने लगा। उसकी मनःस्थिति कुछ ऐसी हो गई कि वह जीवन और संसार से उदासीन ही नहीं पूर्णतया विमुख हो गया। संसार जिसे सुख, जिसे वैभव तथा जिसे महत्व करता है, यह उसे निःसार प्रतीत होने और उनके इस दृष्टिकोण को देख कर सांसारिक उसे बावला समझने लगा। वस्तुतः वही ज्ञानी और तत्व वेत्ता है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ-- सतगुरु ने पूरी शक्ति के साथ शब्द-वाण को शिष्य के प्रति मारा अौर फलतः प्रम या जान को अग्नि शिष्य के सम्पूर्ण शऱीर मे प्रस्फुतटित हो गई। प्रस्तुत साखी मे कवि ने शब्द वर्ण के प्रभाव को स्पप्ट एवं अधिक विस्तार के साथ प्रकट किया है। शब्द वाण का प्रभाव यह पडा, कि शिष्य उन्मन अवस्या मे प्रविष्ट हो गया और उसका चचल मन पगु या गति-विहीन हो गया। भवार्थ--शब्द वाण रुपी सतगुरु के हथियार ने शिष्य के अन्तस य मर्म को गई कर दिया। अब वह् हपं-विपाद की मानव से परै होकर संसार से उन्म या उटामीन हो गया और उसका चचंल मन प्रवान्त हो गया। विशेष-- (१)"हसे न बोले" शिष्य शब्द वाण लगते ही शिष्य संसारिक भवनाओ और प्रतिक्रियाओ से ऊपर उठ गया। वह बोतराग य समार की यतर्थ स्यिति को भली प्रकार समान गया और वह संसार से विमुक्त हो उठा, (२) 'उनमनी' से तात्पर्य है उदामिन। (३) 'चचंल' शब्द का प्रयोग संत साहित्य् में में मन के लिये प्रयुक्त हुआ है। (४) 'मेल्ह्या' का अर्थ है फेंका। शब्द वाण फेंका और शिष्य के मन को गति विहीन कर दिया। (५) 'भीतर' से तात्पर्य है 'हृदय' अन्तस या मर्म। (६) हथियार—शब्द वाण। गूंगा हुवा बावला, बहरा हुआ कान। पाऊँ मैं पंगुल भया, सतगुर मार्या बाण॥
Kabir 1.10
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
"सतगुरु कै हथियारि" कुछ ऐसा "भीतर भिद्या" कि शिष्य का चंचल मन तो पंगु हो ही गया, साथ ही वह उस अवस्था को भी पहुँच गया जिसे "उनमनी" कहा गया है। इतना ही नहीं इस "हथियारि" का ऐसा अद्भुत एवं अकथनीय प्रभाव पड़ा है कि शिष्य की इन्द्रियाँ भी निश्चेष्ट एवं चेतना विहीन हो गई है।
Padārtha — Word-meaning
हुआ = हुवा। पंगुल = पंगु—गतिविहीन।