गुरु से दीक्षा समाप्त हुई और धैर्य का वरदान मिला। कबीर ने मानसरोवर के तट पर हीरा का वाणिज्य किया। विशेष—यहाँ साधना की उन तीन अवस्थाओं का कबीर ने उल्लेख किया है जिसका कवि स्वतः ने अनुभव किया था। थापरिण या स्थापना से अनन्तर धैर्य और तदनन्तर साधक द्वारा हीरा का वाणिज्य। (२) स्थापना या दीक्षा के अनन्तर ही शिष्य को सतगुरु से धैर्य धारण की साधना-पथ पर अग्रसर होने का आशीर्वाद मिला। फलतः साधना में रत रह कर कबीर ने मानसरोवर के तट पर हीरा रूपी हरि का वाणिज्य। (६) थापणि... भई-दीक्षा के अनन्तर थिति मिली।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
थापणि पाई विति भई, सतगुर दीन्हीं धीर। कबीर हीरा-बण्जिया, मानसरोवर तीर॥
Kabir 1.28
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
प्रस्तुत साखी में कवि ने "सतगुर कौ अंग" की साखी २३ तथा १२ का भाव किंचित परिवर्तन के साथ किया गया है। सतगुरु ने धैर्य एवं निर्भय कता का आशीर्वाद दिया और फलतः कबीर ने बहुमूल्य पदार्थों का वाणिज्य किया। यह वाणिज्य हीरे का था।
Padārtha — Word-meaning
थापणि = स्थापना। थिति = स्थिरिता। धीर-धैर्य। वणजिया-वाणिज्य किया। तीर-तट।