सतगुरु ने हमसे प्रसन्न होकर एक प्रसंग कहा। फलतः प्रेम का बादल बरसा और सब अंग आर्द्र हो गए। विशेष–सतगुरु ने शिष्य की योग्यता, सच्चाई और लगन देखकर उसके उपर्युक्त प्रेम का एक प्रसंग प्रस्तुत किया। यह प्रेम का प्रसंग ब्रह्यानुभूति का प्रसंग था। प्रेम का यह प्रसंग इतना प्रभावशाली था कि शिष्य के समस्त अंग उसी से आर्द्र हो गये। इसी भाव से प्रेरित होकर कबीर ने अन्यत्र कहा है कि "लाली मेरे लाल की जित देखूँ तित लाल। लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल।" यहाँ भी प्रेम का अनुराग के रंग में समस्त अंगों के भीग जाने का वर्णन है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ--"चौपडि माँडी चौहटै अरध अरध बाजार।" ऐसे बाजार मे काबीर राम जन से उपदेश देते हुए कहते हैं "शेलौ संत विचार"। शरीर रूपी चौपड मे प्रेम का पाना फेंकने क रूपक कबीर ने यहाँ पर बड़ी स्पष्टता के साथ व्यक्त किया है । विगत साखी मे कबीर ने इस खेल को खेलने के लिए सहजन के विवेक पर विश्वास रखे हैं। यहाँ सतगुरु के निदॅशन के अनुमार दाय चलने का आदेश कबीर ने बताया है । सतगुरु हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग । बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग ॥
Kabir 1.32
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
प्रस्तुत प्रसंग में कबीर ने अनेक बार कहा है कि "सतगुरु मार्या बाण भरि," 'सतगुरु साचा मरिवो, सबद जु बाह्य एक"। "लागत ही मैं मिट गया, पड़या कलेजे छ़ेक" तथा "सतगुरु लई कमांण कहि, बाहण लागा तीर। एक जु बाह्या प्रीति सूं भीतरि रह्या सरीर।" एक शब्द बाण से आहत होने के अनन्तर, अब कबीर का अन्तर प्रेम के बादल से भीग जाने का वर्णन है। यहाँ सतगुरु ने एक प्रसंग कहा है और वहाँ एक कमांन के चलने का उल्लेख है। दोनों का फल एक ही है। परन्तु प्रभाव दोनों का दिव्य, असाधारण और ब्रह्यानुभूति है।
Padārtha — Word-meaning
रीझि = प्रसन्न । बरस्या = बरसा । भीजि = भीगि = भीग।