सतगुरु के श्री चरणों पर मैं अपने इस शरीर को अधम पचतत्वों से विनिर्मित शरीर को जो हाटी के सदृश निःसार है—शतशः बार न्यौछावर करता हुँ। सतगुरु को मुझ दोषों से अभिशप्त वासनाओं से ग्रस्त अधर्म प्राणी को दिव्यता प्रदान करने में बिलम्ब न लगा। यही उनकी महत्ता है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
बलिहारी गुरु आपणैं, द्यौं हाड़ी कै वार। जिनि मानिप तैं देवता, करत न लागी वार॥
Kabir 1.2
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
सतगुरु में दिव्य शक्ति है। उन्होंने हाड़ी के सदृश इस तुच्छ, हीन शरीर को दिव्यता प्रदान की। उनके प्रसाद से यह शरीर अब सार्थक हो गया।
Padārtha — Word-meaning
बलिहारी = न्यौछावर। आपसौ = अपने, मेरे। द्यौं = दूर कर दूँ। हाड़ी—मृतिका पात्र। कै = कितनी। कै बार=कितनी बार। जिनि = जिन—जिन्हें। मानिष = मानुष = मनुष्य। नै = ने। वार = विलम्ब।