-शरीर को चौपड पर प्रेम का पाना पकड़ कर, सतगुरु के आदेशानुसार कबीर दाव चल रहा है । विशेष--प्रेम का पासा और शरीर का चौपड यही ही यथार्थ और युमिसगत अप्रस्तुत योजना । शरीर के चौपड पर प्रेम के पासे का खेल स्वाभाविक और लौचित्यपूर्ण है। प्रेम के इस खेल मे दाव बचाने वाला या निर्देशन देने वाला सतगुरु ही कुशल गुरु के निर्देशन समप्राप्त हो जाने के कारण शिष्य के लिए परामद का कोइ अवसर नहीं है । "खेलै दास कबीर" मे आत्मविश्वास दृढ़ता तथा सतगुरु पर आस्था का भाव प्रतिबिम्बित होता है ।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ--कबीर ने प्रस्तुत अग की साखी १२ एव्ं १६ मे वाणिज्य का उल्लेख किया है । अब प्रस्तुत साखी एवं आगामी साखी मे चौपड़ एवं पासा के खेल का उल्लेख किया । आध्यात्मिक जगत मे चौपड का भिन्न अर्थ होना है । पासा पकड़या प्रेम का, सारी किया सरीर । सतगुर दाव घताइया, खेलै दास कबीर ॥
Kabir 1.31
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
सारी = चौग्ड । सरीर = शरीर । दाव = दाव, चाल । बताइया = बता रहा है।