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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

संदर्भ—सतगुरु ने शिष्य के अनन्त लोचन ही नहीं उदघाटित किया, वरन् उसे धैर्य का वरदान भी दिया। साथ ही सतगुरु ने निःशक होकर ईश्वराराधना करने का भी उपदेश दिया। सतगुर मिल्यात का भया, जे मनि पाड़ी भोल। पामि विनंठा कप्पढा, क्या करै विचारी चोल॥

Kabir 1.24

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Translations & commentaries(2)

Sūtra Translation

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यदि मन ही भूलों से भरा है तो, सतगुरु का मिलना और न मिलना समान है। यदि पास में विनष्ट या फटा। कपड़ा है, तो उसके आधार पर तैयार किया हुआ अधीवस्त्र की क्या उपयोगिता होगी। विशेष—प्रस्तुत साखी में शुलभ एवं सरल अप्रस्तुत योजना के माध्यम से कबीर ने यह कहा है कि यदि शिष्य का मन माया में ही अनुरक्त है तो सतगुरु बेचारे का क्या दोष। फटे हुए कपड़े से शरीर नहीं ढका जाता है। यदि इतना होने पर भी कोई फटे हुए वस्त्र से चोल या चोली मिले और उससे शरीर आवृत नहीं सकते, कपड़े का क्या दोष।

Padārtha Word-meaning

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त = सो। का = क्या। भवा = हुआ। जो = यदि। पाडी = पारी या आच्छादित। भोल = भ्रम। पासि = पास अधिकार में। विनठा = विनष्ठ। कप्पड़ा = कपड़ा। चोल = चोली।